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23 Jul 2025 · 1 min read

दोहा त्रयी. . . . एक सोच

दोहा त्रयी. . . . एक सोच

तन के लोभी सब मिले, मन का मिला न मीत ।
ऐसे करते प्यार ज्योँ , निभा रहे हों रीत ।।

आशिक भौंरे दिलजले, कलियों के शौकीन ।
क्षुधा मिटा सब चल दिये, उनका सब कुछ छीन ।।

तन पर अंकित कर चले , कामुक अपना काम ।
पावन दूषित कर गए, मनुज मनुज का चाम ।।

सुशील सरना / 23-7-25

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