अनुभूति प्यार की
कैसे कहूँ उस प्यार की,
पहली नज़र का उल्लास कैसा था।
दिल की छुवन का वो,
अलौकिक जज़्बात कैसा था।
अब तक सोचता हूँ,
क्या नाम दूँ उस अनुभूति को।
तपती रेत पर गिरी बूँद का,
अहसास कैसा था।।
दीदार हुस्न का उनके,
जब इश्क़ ने किया पहली बार।
अपलक देखता ही रहा,
तोड़कर बंदिशों के सब द्वार।
अब तक सोचता हूँ,
क्या नाम दूँ उस अनुभूति को।
अनमना सा लुट चुका था मुसाफिर,
किये बिना कोई प्रतिकार।।
कहाँ इल्म था खंज़र की,
नुकीली धार कैसी थी।
आँखों ही आँखों में कर गयी,
छलनी वो झंकार कैसी थी।
अब तक सोचता हूँ,
क्या नाम दूँ उस अनुभूति को।
जिगर के पार हुई जो,
वो जुल्मी तलवार कैसी थी।।
उस अल्हड़ मासूम से,
प्यार का सुरूर ही ऐसा था।
बेखुदी में ऐसे लुटे,
न जाने नज़रों का कुसूर कैसा था।
अब तक सोचता हूँ,
क्या नाम दूँ उस अनुभूति को।
पुष्प के जाल में कैद था भौरा,
पता नही वो मज़बूर कैसा था।।
#स्वरचित व मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’