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23 Jul 2025 · 1 min read

झम झम हथिया बरसैत जो,

झम झम हथिया बरसैत जो,
जाकऽ दखै खेत-खरिहान,
नाइच रहल छै गिरहत के धान,
सऊॅंसे खेत में कदबा पसरल,
बिन जल खेत छलै सब खिसरल,
मुंह तकर हिलकोरने जो,
झम झम हथिया बरसैत जो।

आश लगौने पोउनी-पसारिण,
बीच बीच गाबै मलहारिन,
इन्द्र देव के करै गोहारि,
फुफरि परल अछि बीच- कछाइर,
बिचकल मुंह हरषैणे जो,
झम झम हथिया बरसैत जो।

सत्रह दिन छौ तोहर ऐनाय,
पानि पीरहि हम देबौ खेनाय,
लोह टीन सों करिहें शोर,
सोना चांनी बरसै घनघोर,
धान पाइन झकझोरते जो
झम झम हथिया बरसैत जो।

थम थम तोरो देबौ दूटा पान,
कटतै जखैन खेतक धान,
मुंह चिबाकऽ जिह्वा देखियें,
हेतौ कनिया केहन तहने बुझिहें,
मोने – मोन मुस्कैते जो,
झम झम हथिया बरसैत जो

उमा झा🙏💕

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