"ज़िंदगी – एक पहेली"
“ज़िंदगी – एक पहेली”
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ज़िंदगी एक सवाल है,
जिसका जवाब किताबों में नहीं मिलता,
न तजुर्बे में, न तर्क में,
बस अहसासों की गिरहों में उलझा रहता है।
कभी ये ख़ुशी की तरह खिलखिलाती है,
तो कभी आँसुओं की तरह बह जाती है।
हम सुलझाते हैं इसे
हर रोज़… हर मोड़ पर…
मगर ये फिर एक नई गुत्थी बनकर
सामने आ जाती है।
ज़िंदगी कोई हल चाहने वाली समस्या नहीं,
बल्कि एक सफ़र है—
जहाँ रास्ते ही मंज़िल बन जाते हैं,
और मंज़िल… बस एक भरम।
हम ढूंढते हैं अर्थ,
पर वो अर्थ ही सवाल बनकर लौट आता है।
और तब समझ आता है कि—
“जिसका हल कोई मिल नहीं सकता,
ज़िंदगी ऐसी ही पहेली है…”
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद