नीरवता की साथी
लॉकडाउन का समय था। स्कूल बंद थे, गली-सड़कें सुनसान, और समय जैसे थम सा गया था। ऐसे में मैं पूरे दिन घर पर ही रहता, किताबों और मोबाइल से मन जल्दी ऊब जाता। लेकिन उस सन्नाटे और खालीपन में एक सफेद रोशनी की तरह वह आई — एक सुंदर, शांत, और सौम्य सफेद गाय।
वह रोज़ दोपहर के समय हमारे गली में आ जाती। पता नहीं कहां से आती थी, पर उसका समय एकदम तय रहता था — जैसे किसी स्कूल की घंटी पर आती हो। मुझे पहले से ही गायों से बहुत प्रेम था, लेकिन इस गाय से मेरा रिश्ता कुछ अलग ही था। वह मुझे देखकर रुक जाती, धीरे-धीरे मेरे पास आती, और मेरा हाथ अपनी गरदन से छुआकर चाटने लगती। उसकी आंखों में जो मासूमियत थी, वह किसी अपने जैसी लगती थी।
मैं उसके लिए कभी बची हुई रोटी लाता, कभी हरी पत्तियाँ, और घर में रोज गाय की पहली रोटी तो बनती ही थी। धीरे-धीरे यह दिनचर्या बन गई — वो आती, मैं उसका इंतज़ार करता, और हम दोनों दोपहर के कई घंटे एक-दूसरे की संगत में बिताते। मैं उसकी पीठ पर हाथ फेरता, उसके कान सहलाता, और कभी-कभी गले भी लग जाता। वो बिना कुछ कहे मेरी भावनाओं को समझ लेती थी — जैसे उसके भीतर कोई मौन आत्मा थी जो मुझसे बात करती थी।
उसके बिना मेरा दिन अधूरा लगता। वह मेरी एकांत दुनिया में सजीव प्रेम का स्पर्श थी। ना कोई भाषा, ना कोई शर्त — बस एक निश्छल साथ।
लेकिन एक दिन सब बदल गया।
मैं रोज़ की तरह उसे देखने बाहर गया, पर वो नहीं आई। दिन बीता, फिर दूसरा दिन, और फिर एक हफ्ता — पर वो गाय फिर कभी नहीं दिखी। मोहल्ले वालों से पूछा तो किसी ने बताया कि किसी ने उसे बाँध लिया है, शायद उसे कहीं ले गए हैं। दिल बैठ गया। एकदम खालीपन सा छा गया।
लॉकडाउन खुला, स्कूल फिर से शुरू हो गए। जीवन की रफ्तार वापस लौट आई, लेकिन उस सफेद गाय का अभाव मेरी स्मृतियों में अब भी ताज़ा है। हर दोपहर जब सूरज की रोशनी वैसी ही पड़ती है, मेरे मन में वही दोपहरें लौट आती हैं — जब मैं और वो साथ होते थे।
कभी-कभी सोचता हूँ — क्या उसे भी मेरी याद आती होगी? क्या वो मुझे पहचान पाएगी अगर हम कहीं दोबारा मिलें? या वो पल अब केवल मेरी स्मृति का हिस्सा बन गए हैं?
वो गाय मेरे जीवन की एक मौन कथा बन गई है — बिना शब्दों की, लेकिन भावों से भरी।
और आज भी जब मैं छत से दूर खेतों की ओर देखता हूँ, मेरी आँखें उसे ढूँढ़ती हैं। शायद… वो भी कभी किसी कोने से मेरी ओर देख रही हो।