*"वर्षा की शीतल छाया"*
बड़े अरसे के बाद घन गरजे नभ में,
सजी धरा हरियाली की रश्मि नभ से।
तपते तन को मिली जो शीतल छाया,
प्रकृति ने हो जैसे मधुर गीत गाया।
धूप की तपन से जर्जर थे पथ,
सूखी नदियाँ, थके थके थे रथ।
पर बूँदों ने जब धरती चूमी,
हर कली ने फिर से साँस ली झूमी।
पत्तों ने ओस की बूँदें पाई,
चिर प्रतीक्षित जीवन मुस्काई।
धरती ने ओढ़ी हरियाली चूनर,
फूलों ने गाया मधुमय सुगंध सुर।
किसान के चेहरे पर आई मुस्कान,
भरा विश्वास, जागा नव प्राण।
खेतों में उमंग, मन में उमंग,
वर्षा ने बाँधे जीवन के रंग।
हे मेघराज! तू सदा यूँ बरस,
भर दे जग को सुख-शांति-विवश।
बड़ी प्रतीक्षा के पश्चात जो आए,
तेरी कृपा से सब सुख पाएं।