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22 Jul 2025 · 4 min read

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: कविराज का राज (आयुर्वेदिक नुस्खे, वैद्य हट्टी सिंह पुत्र सीताराम द्वारा लिखित वैद्यामृतसार 1873 ईसवी)
संपादन: अंजली शर्मा
301-Cosmos tower, LBS Marg,Thane-400601
Mobile 9748490990
एवं हरिशंकर शर्मा
213, 10-बी स्कीम, गोपालपुरा बायपास, निकट शांति दिगंबर जैन मंदिर, जयपुर 302018 राजस्थान
मोबाइल 9257 446828
तथा 94610 46594
प्रकाशक: दृशी प्रकाशन, 104, सिद्धार्थ नगर, मदरामपुरा, सांगानेर, जयपुर 302029 राजस्थान
मोबाइल 8209 640202
संपादित संस्करण: 2025
मूल्य: ₹300
कुल पृष्ठ संख्या: 182
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*समीक्षक”: रवि प्रकाश पुत्र श्री राम प्रकाश सर्राफ, बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
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1873 ईस्वी में प्रकाशित काव्यमय आयुर्वेदिक नुस्खे
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पुराने वैद्यों के नुस्खे बहुत मशहूर थे। परंपरागत रूप से आज भी घर-घर में इनके माध्यम से ही विभिन्न रोगों के इलाज चल रहे हैं। आयुर्वेद के यह नुस्खे प्राकृतिक जड़ी-बूटियों अथवा यों कहिए कि घर की रसोई अथवा पंसारी की दुकान पर मिलने वाली सामग्री से तैयार होते हैं।आज भी इनकी उपयोगिता कम नहीं हुई है।

पुराने जमाने में ऐसे वैद्य भी हुए हैं, जिन्हें आयुर्वेद का भी ज्ञान था और जो काव्य-कला में भी निपुण थे। ऐसे ही एक वैद्य हट्टी सिंह पुत्र सीताराम थे। आगरा के हसनपुरा क्षेत्र में रहते थे। 1873 ईसवी में इन्होंने वैद्यामृतसार नामक पुस्तक लिखी थी। यह पुस्तक आगरा के ‘मतवआ इलाही’ में मूच्छ खॉं के प्रबंध से कम्बटोले में छपी थी। इसमें हिंदी के छंदों में विभिन्न रोगों के संबंध में आयुर्वेदिक इलाज बताए गए हैं। अब वर्ष 2025 में “कविराज का राज” (आयुर्वेदिक नुस्खे) नाम से वैद्यामृतसार को अंजली शर्मा और हरिशंकर शर्मा ने संपादित करके सुंदर रूप में प्रकाशित करवाया है। पुराना ग्रंथ लीथोप्रिंट था, जिसमें छपाई काफी धुंधली आती है। लेकिन अब नए प्रकाशन में पाठकों को पढ़ने की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो गई है।

मूल पुस्तक में केवल पद्य (काव्य) के द्वारा ही नुस्खे लिखे गए हैं। हरिशंकर शर्मा ने पद्य के साथ-साथ मेहनत करके इसमें गद्य रूप से व्याख्या भी जोड़ दी है। इससे पुस्तक को पढ़ना और समझना पाठकों के लिए सरल हो गया है। इस कार्य को आप ऐसा ही समझ लीजिए जैसे रामचरितमानस में हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का योगदान रहा है।

पुस्तक में बताए गए सभी नुस्खे चार पंक्तियों में हैं। दो-दो पंक्तियों के दो छंद हैं । प्रत्येक छंद में प्रत्येक पंक्ति में 28 मात्राएं हैं। 16 मात्राओं के बाद यति है। दो पंक्तियों का तुकांत समान है। अंतिम दो पंक्तियों का तुकांत पहले दो पंक्तियों के तुकांत से भिन्न है। छंदों में प्रवाह है, जिससे स्पष्ट है कि कविराज को आयुर्वेद के साथ-साथ काव्य कला में भी निपुणता प्राप्त है। आइए एक आयुर्वेदिक नुस्खे पर नजर दौड़ाई जाए:-

गज केसर पद्माख औ मिसरी तोल बराबर धरिए/ जतन अरस को कहो छबीलो वह भी वर्णन करिए/ प्रातकाल जो या कहुॅं चाटे तेरी ही सूं बाला/ रक्त वबासी जात घड़ी में ज्यों समीर घन माला (पृष्ठ 56)
उपरोक्त काव्य पंक्तियों के नीचे ही गद्य में भी इस नुस्खे को इस प्रकार समझाया गया है:-

गजकेसर, पदमाख और मिश्री बराबर मात्रा में तोल कर लें और प्रातः काल इसे चाटें। इससे रक्त बवासीर पलभर में ऐसे भाग जाए, जैसे बादलों को समीर (वायु) उड़ा कर ले जाती है।

एक अन्य नुस्खे में जीभ के सन्निपात के बारे में बताया गया है। घरेलू इस्तेमाल की मसाला-वस्तुओं से यह नुस्खा बना है। नुस्खा कविता के रूप में इस प्रकार लिखा गया है। गद्य में भी इसको समझाया गया है। देखिए:-

जावित्री केसर अरु कत्था त्रिकुटा लोंग छबीली। बद्रीफल सम गुटका कीजै मुख में धरे रंगीली।। रसना कोमल होत घटी में सन्निपात की मारी। कफ खॉंसी तप श्वांस नशावे छिन में राज दुलारी।।
अर्थात जावित्री केसर कत्था त्रिकुटा (काली मिर्च + पीपल + लोंग) बद्रीफल (बेर) सम मात्रा में मिलाकर मुख में रखें। इससे जीभ का सन्निपात समाप्त होकर जीभ कोमल हो जाएगी। कफ खांसी गरम श्वास का दोष भी दूर हो जाएगा। (प्रष्ठ 45, 46)

उपरोक्त नुस्खे में साधारण इलाज है। घर की रसोई में कुछ सामान मिल जाएगा, कुछ पंसारी की दुकान पर सरलता से उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन यह भी पुस्तक में लिखा हुआ है कि बिना वैद्य की सलाह लिए यह इलाज न किया जाए अर्थात मनमाने तरीके से पुस्तक को पढ़कर अमल करना ठीक नहीं रहेगा।

वैद्य अपनी चमत्कारिक परीक्षा-पद्धति के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। पुस्तक में एक स्थान पर बताया गया है कि कॉंस्य के पात्र में मूत्र की धार को डालकर उससे जो ध्वनि निकलती है, उससे बहुत कुछ अनुमान चिकित्सक लगाते हैं। (पृष्ठ 24)

पुस्तक में जो नुस्खे लिखे गए हैं, वह विभिन्न प्रकार की बीमारियों के निदान के हैं। अठारह अध्यायों में पुस्तक विभाजित है। नाड़ी परीक्षा, ज्वर, अतिसार, स्त्री चिकित्सा, बाल चिकित्सा आदि विविध प्रकार के सैकड़ों रोगों पर इस पुस्तक में कारगर नुस्खे दिए गए हैं। भाषा हिंदी होते हुए भी कहीं सरल है और आसानी से समझ में आ सकती है;तो कहीं खड़ी बोली के अभ्यस्त पाठकों को नुस्खों का यह काव्य-रूप कठिन और समझ में न आने वाला भी लगेगा। ऐसे पाठकों को गद्य पढ़कर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।

इस पुस्तक से पता चलता है कि महान वैद्य अपने नुस्खों को छुपा कर नहीं रखते थे। बल्कि उन्हें सार्वजनिक भी करते थे और जनता की जुबान पर चढ़ जाने की दृष्टि से उन्हें सुंदर गाने योग्य छंदों में प्रस्तुत करने की क्षमता भी रखते थे। अगर यह पुस्तक नहीं लिखी जाती, तो वैद्य हट्टी सिंह पुत्र सीताराम का ज्ञान डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही संभवतः अतीत का विषय बन जाता। लेकिन यह आज भी आयुर्वेद के अध्ययनकर्ताओं के लिए एक शोध ग्रंथ के रूप में उपलब्ध है, यह एक बड़ी बात है। पुस्तक की छपाई और आकर्षक कवर पाठकों का मन मोहने में समर्थ है। डेढ़ सौ वर्ष के बाद जिन्होंने “कविराज का राज” फिर से दुनिया के सामने रखा है, ऐसे संपादक-द्वय बधाई के पात्र हैं।

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