जीर्ण हो चला है वो ख़त
जीर्ण हो चला है वो ख़त अब,
जिसमें लिखा था तेरा नाम,
हर अक्षर से उठती है अब भी,
तेरे साँसों की इक मदिरा शाम।
वो दिन भी कितना सुनहरा था,
जब तूने उसे थमाया था,
मुस्कान में छुपा था सारा प्यार,
हर हरफ़ में तू समाया था।
अब वो ख़त है मुरझाया सा,
जैसे दिल मेरा बिन तेरे,
विरह की आग में जलता है,
हर लफ़्ज़ पिघलता है धीरे-धीरे।
तेरी यादों की चुप आहट,
अब भी इन दीवारों में गूंजे,
हर कोना तेरा नाम पुकारे,
मेरी तन्हाईयों में तू ही बूझे।
जीर्ण हुए उस खत के संग,
मैं भी कुछ बिखर गया हूँ,
प्रेम में खोकर खुद से,
तेरे भीतर ही उतर गया हूँ।
Surinder