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22 Jul 2025 · 2 min read

शिव चालीसा

दोहा

चरण कमल में ध्यान धर, प्रभु करते गुणगान।
आन विराजो कंठ में, मेरे कृपानिधान।।

इतनी सी अरदास है, दीनबंधु करतार।
कलम सदा लिखती रहे, महिमा अमित अपार।।

चौपाई

जयति जयति जय हे शिव शंकर।रौद्र रूप विकराल भयंकर।।
जटा- जूट सर गंगा सोहे। रूप निराला मन को मोहे।।१।।
कानों में वृश्चिक के कुंडल। शोभित दाएँ हाथ कमंडल।।
बाएँ त्रिशूल प्रलयंकारी।भोले शंकर त्रिनेत्र धारी।।२।।
गल पहले मुंडों की माला।सोहे काला नाग विशाला।।
वाम अंग माँ उमा विराजें।भस्म त्रिपुण्ड भाल पर साजे।।३।।
नीलकंठ बाघम्बरधारी।महादेव शंकर त्रिपुरारी।।
सारे तन पर भस्म रमाए।गल रुद्राक्ष माला लटकाए।।४।।
नंदी जी की करें सवारी।गिरिजापति भोले भंडारी।।
भाँग धतूरा मन अति भाता।गंगाजल शिव सुन्दर नाता।।५।।
गौरवर्ण नैना कजरारे।काले घने केस अति न्यारे।।
मस्तक पर चन्द्रमा निराला।बैठे हैं शिव मृग की छाला।।६।।
शिव औघड़दानी अविनाशी। धर्मनिष्ठ योगी कैलाशी।।
जिनके गण हैं भूत भयंकर।रौद्र रूप शिव का प्रलयंकर।।७।।
तीनों लोकों के हैं स्वामी।सकल देव जिनके अनुगामी।।
त्रिपुरासुर के प्रभु हो नाशक।बल बुद्धि विद्या ज्ञान प्रकाशक।।८।।
निराकार साकार तुम्हीं हो।सकल सृष्टि आधार तुम्हीं हो।।
रहते तप में लीन हमेंशा।हरते सब के सकल कलेशा।।९।।
सर्व सिद्धियों के शिव ज्ञाता।सारे जग के भाग्यविधाता।।
करते रहते नित्य साधना।पूरी करते मनोकामना।।१०।।
दीनबंधु करुणा के सागर।परमवीर समरथ भटनागर।।
कैलाशी घट घट के वासी।परम गुणी साधु संन्यासी।।११।।
नीलकंठ शिव त्रिनेत्रधारी।सकल सृष्टि के पालनहारी।।
जग में तुम सा न अन्य दानी।सकल सृष्टि कहती वरदानी।।१२।।
कालों के भी काल आप हो।प्रलय रूप विकराल आप हो।।
सकल गुणों की खान आप हो।भूतनाथ भगवान आप हो।।१३।।
नहीं जगत दूजा धनुधारी।जालंधर अंधक संहारी।।
जीवन दाता हो संहारक।मृत्यु मोक्ष के प्रभु हो कारक।।१४।।
देवाधिदेव डमरूधारी।कष्ट निवारक मंगलकारी।।
ज्ञानी,ध्यानी,परम विज्ञानी।अमरनाथ बाबा बर्फानी।।१५।।
राम नाम की जपते माला।पी जाते शिव विष का प्याला।।
महाकाल, भीलपति, कपाली।शान आपकी सबसे आली।।१६।।
आदि अजन्मा नव्य पुरातन।सतचित सुखमय सत्य सनातन।।
अजब निराली शिव की माया।कड़ी धूप में शीतल छाया।।१७।।
राम नाम की टेर लगाए।राम नाम की अलख जगाए।।
राम नाम शिव को अति प्यारा।राम रटे शिव बारम्बारा।।१८।।
शिव शंकर काशी के वासी।हर लें तन की सकल उदासी।।
शिव नाम की जपे जो माला।पड़ता कभी न दुख से पाला।।१९।।
कष्ट सभी शिव उसके हरते।जो नर शिव का पूजन करते।।
नित्य पढ़ें जो शिव चालीसा।उसके बदन न रहे कलेशा।।२०।।

दोहा
पूजन नित करता रहूँ,धरूँ आपका ध्यान।
मेरे अंतस में बसो, कृपासिन्धु भगवान।।

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

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