अब ना हम किसी से वादे हज़ार करते है।
अब ना हम किसी से वादे हज़ार करते है।
अब इन निग़ाहों को किसी के नज़रों में कैद रखते है।।
बंद रहती हैं अब सभी दर-ओ-दीवार की साकियाँ।
क्योंकि अब अपनी निग़ाहों को तेरी निगहबानी में कैद रखते है।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”