बबुआ महाराज
गाँव के किनारे मिट्टी के रास्ते से थोड़ा हटकर एक पुराना सा खपरैल वाला घर था — वहीं रहते थे बबुआ महाराज।
असली नाम क्या था, अब किसी को याद नहीं। गाँव में सब उन्हें बबुआ महाराज कहकर ही पुकारते थे।
उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था कि वे बामन कुल में जन्मे हैं — माथे पर सूखी हुई चंदन की रेखा और कंधे पर फीका होता जनेऊ।
पर अब बस नाम भर का बामन रह गए थे, और नाम के साथ एक भ्रम भी जुड़ गया था —
“बामन है तो भांग तो खाएगा ही।”
गाँव में ये धारणा कैसे फैली, पता नहीं, लेकिन बबुआ महाराज खुद भी इस भ्रम में ऐसे रम गए कि भांग उनका धर्म बन गया।
उनके दिन खेतों में बीतते और शामें — भांग और गायों के साथ।
बबुआ खेती करते थे — छोटा-सा खेत था, जिससे साल भर का गुज़ारा मुश्किल ही होता।
दो गायें थीं, घर की आत्मा जैसी। उनका दूध न कभी बाज़ार गया, न किसी के घर। गोबर भी खेत में ही लगता, जलावन बनता।
गायें उनके लिए जीवन का हिस्सा थीं, कुछ-कुछ पूजा की मूर्तियों जैसी — जिनसे कुछ माँगना नहीं होता, केवल सेवा की जाती है।
पत्नी थीं — जीवित, मगर कथा में कहीं दूर।
दिन भर गाँव में चरखा चलातीं, सूत काततीं और कुछ पैसों में घर का जुगाड़ करतीं।
घूंघट में रहतीं, और थककर चुपचाप उसी चूल्हे के पास बैठ जातीं जहाँ कभी बबुआ की माँ बैठा करती थीं।
बातूनी कम थीं, जैसे समय ने उनके भीतर की आवाज़ को धीमा कर दिया हो।
तीन संताने थीं —
बड़ा बेटा शंभू, जो धीरे-धीरे शहर की ओर बढ़ता सपना देखने लगा था;
बड़ी बेटी सोनी, घर-गृहस्थी की रीढ़;
और सबसे छोटी — गुड़िया।
नाम सुनते ही जैसे हवा एक पल को ठहर जाती।
गुड़िया हँसती तो जैसे दीवारें भी सुनतीं।
पर कभी-कभी, जब बबुआ शाम को भांग पीस रहे होते, तो वह धीरे से माँ के पास जाकर कहती —
“अम्मा, बापू को भांग के आगे कुछ दिखता ही नहीं…”
और फिर चुप हो जाती — जैसे किसी ने बहुत बार कहकर थक चुकी हो।
शाम को बबुआ भांग सिलबट्टे में पीसते थे — बिल्कुल ध्यान में डूबे साधक की तरह।
हाथों में लय होती, आँखें मूँदी हुईं, और पास में रखा लोटा जैसे किसी पूजा की थाली।
उस वक्त न उन्हें कुछ सुनाई देता, न दिखाई।
गुड़िया जब बीमार पड़ी, तो शुरू में सबने सोचा — बस मौसमी कमजोरी है।
लेकिन जब उसकी आंखें पीली पड़ गईं और शरीर धीरे-धीरे बिस्तर में समा गया, तो घर में चिंता ने डेरा डाल लिया।
इलाज के पैसे नहीं थे। और तब गाँव के एक झाड़-फूंक वाले को बुलाया गया।
उसने नीम की टहनी घुमाई, कुछ मन्त्र बुदबुदाए और कहा,
“ऊपर का असर है… उतर जाएगा।”
असर नहीं उतरा, गुड़िया चली गई।
उस दिन बबुआ ने भांग नहीं पी।
चारा भी नहीं लाए। पहली बार आँगन में चुप बैठे रहे —
आँखें आसमान में, जैसे किसी जवाब की तलाश में।
उस रात चरखे की आवाज़ भी नहीं आई।
पत्नी खामोश थी, सोनी तकिये में मुँह दबाए रो रही थी, और शंभू कहीं कोने में चुपचाप बैठा था।
पहली बार उस घर में भांग की गंध नहीं थी — सिर्फ उदासी की गंध थी।
लेकिन ये ठहराव एक दिन का ही था।
अगली शाम बबुआ फिर उसी सिलबट्टे पर बैठे।
भांग को फिर उसी लय में पीसा, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
गुड़िया की मौत के बाद भी बबुआ नहीं बदले।
जैसे शोक भी उनके भीतर किसी दीवार से टकराकर लौट आया हो।
समय बीतता गया।
शंभू शहर चला गया — बिना कुछ कहे।
वहाँ उसने मजदूरी की, छोटे-मोटे काम किए और कुछ ही महीनों में घर पैसे भेजने लगा।
धीरे-धीरे खपरैल की जगह पक्की छत आ गई।
दीवारें भी ईंटों की हो गईं।
घर अब गाँव में चमकने लगा।
सोनी की शादी भी हो गई — शंभू ने सारी व्यवस्था बहुत अच्छी की थी।
बेटी विदा हो गई — बबुआ तब भी नहीं बदले।
गाँव में लोग कहते —
“अब बबुआ के घर समृद्धि है।”
लेकिन कभी-कभी ये भी फुसफुसाते —
“गुड़िया ही तो गरीबी का कारण थी… उसके जाते ही जैसे दरवाज़े खुल गए पैसे के…”
बबुआ ने कभी कोई जवाब नहीं दिया।
बस उसी कोने में बैठकर भांग पीसते रहे —
जैसे उस आवाज़ को भी सिलबट्टे पर कूट देना चाहते हों। बबुआ अब भी शाम को चारा काटते हैं,
और फिर उसी सिलबट्टे पर बैठकर भांग पीसते हैं —
उसी निष्ठा से, जैसे किसी पुरानी प्रतिज्ञा को निभा रहे हों, कोई यज्ञ कर रहे हो।
पत्नी अब बूढ़ी हो गई हैं। आँखें कमजोर हो गई हैं, पर सूत अब भी कातती हैं।
कभी-कभी पूछती हैं —
“अब क्या रहा इस भांग में?”
बबुआ चुप रहते हैं।
बस हल्की हँसी हँसते हैं — “अब यही तो रहा है।”
शंभू कहता है —
“बाबू, चलो शहर, अब आपके लिए कोई काम नहीं बचा गाँव में।”
बबुआ मुस्कराकर कहते हैं —
“शहर में सिलबट्टा कहाँ मिलेगा बेटा…”
अब घर में सिर्फ बबुआ और उनकी पत्नी रह गए हैं।
घर में अब टीवी भी है, छत पक्की है, बाथरूम है।
लेकिन आँगन के उस कोने में सब वैसा ही है —
जहाँ बबुआ हर शाम सिलबट्टे पर भांग पीसते हैं।
गुड़िया की याद अब किसी से साझा नहीं होती,
शंभू की आवाज़ अब फ़ोन में आती है,
सोनी की चूड़ियाँ अब किसी और देहरी में खनकती हैं।
लेकिन बबुआ अब भी उसी शाम में जीते हैं —
जहाँ भांग की गंध है, चारा है, और एक चुप बैठा आदमी है जो कभी बदला ही नहीं।