वसीयत
‘वसीयत’
अरसा बीत गया घर छोड़े हुए,
पर घर ही तो छोड़ा था; शहर नहीं।
सो कभी न कभी तो…
उस घर की गली से गुजरना ही पड़ता;
चाहे अनचाहे।
कल परसों, अचानक गली से गुजरते हुए
घर की दहलीज तक जा पहुँची।
कह नहीं सकती अनजाने में या
कुछ था ! जो ले गया था उस तक।
होश तो नहीं था,आकर्षण रहा हो शायद !
अंदर से आवाज सुनाई दे रही थी,
जानी पहचानी थी।
जैसे कोई लिखा हुआ खत पढ़ रहा हो….
दिन धुंधला गया था।
दहलीज पर पाँव रखते ही;
कोई आकर एक कागज का टुकड़ा पकड़ा गया,
जैसे वो जानता था कि मैं आने वाली हूँ।
शायद उसने मेरी पदचाप सुन ली थी।
मैंने पूछा, “क्या पढ़ रहे हो? क्या लिखा है?
किसके लिए लिखा है?”
वो बोला, “कुछ नहीं, बेकार है, तुम्हारे मतलब का नहीं।”
मैंने वो कागज़ का टुकड़ा खोला;
जो एक अपरिचित मेरे हाथ में पकड़ाया गया था।
लिखा था; पीछे की तरफ,
बाहर की दीवार के आले में कुछ रखा है….
तुम्हारे लिए, ले जाओ।
मैंने सोचा, चलो कुछ तो ख्याल है मेरा।
बहुत दिनों बाद ही सही,
बल्कि पहली बार मेरे लिए कुछ है।
जाकर देखा,
आले में तह किया हुआ एक परचा था।
खोला; तो अक्षर की आकृति के कुछ खिलौने से थे,
मुझे बहलाने के लिए।
बाद में मुझे मालूम पड़ा कि वो मेरी सुध नहीं थी,
एक मायाजाल था मुझे बहलाने का।
ठीक वैसे ही जैसे एक अबोध बालक को
बहलाया जाता है…..
पानी की थाली में चाँद को उतारकर,
चंदा का खिलौना बताकर।
बालक उसको देखता रह जाता है,
और मां अपना जरूरी काम कर डालती है।
लेकिन उसमें मुझे कुछ और भी मिला था…,
और वो था; मेरी बेदखली का साक्ष्य।
किसी के नाम की वसीयत….!
गोदाम्बरी नेगी ‘गौरी’