मौन–मिलन
मौन–मिलन
— एक यात्रा भीतर की ओर —
एक तुम हो यहाँ, एक मैं हूँ यहाँ
हमारी साँसें ही बातों को करती बयाँ।
न कोई प्रश्न है, न ही उत्तर कोई,
मौन में डूबे हैं सारे संवाद भी।
हमारी चुप्पी ही स्पर्श खुद कर रही,
बात अंतःकरण की — वो कुछ कह रही।
आज सन्नाटा भी डर पे है मेहरबाँ,
दिल की धड़कन है बोले — जो खुद बेज़ुबाँ।
ये जो पल है, ठहर-सा गया है कहीं,
जैसे युग-युग से बैठी हो तुम भी यहीं।
श्वांस की चाहतों ने है तुझको चुना,
मन-स्पंदन की थिरकन ने तुमको गुना।
बुन न पाता तुम्हारे धनक-आसमाँ,
सदियाँ लिख न सकीं — तुम हो वो दास्ताँ।
शून्यता कर रही है जो ध्वनि से मिलन,
मौन से मौन का कैसे होगा हवन?
फ़ासलों में करीबी-सी दूरी रही,
मन-कहानी जो मन में ही पूरी हुई।
भटकी आँखों का न कोई हद-ए-निशाँ,
मैं अकेला रहा, ढूँढ़ता कारवाँ…
✍️ कुँवर सर्वेन्द्र विक्रम सिंह
🔸 स्वरचित रचना
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