वाणी संयम की मिठास
वाणी संयम की मिठास(कहानी)
संतोष कुमार मिरी
“विद्या वाचस्पति”
छत्तीसगढ़_भारतीय परंपरा से ओतप्रोत बहु रानी की कहानी।जिन्होंने घर परिवार को संवारा।
अजी सुनते हो बरखा…
बहु रानी के मुंह दिखाई में 5 एकड़ खेत.. इनके नाम करता हूं।और सगुण के 101 रुपया भी।बरखा सुनते ही अपने पति के लिए दांत पिस्ते हुए बाहर आई कहा _”तुम्हे शर्म नहीं आती” आज तक मुझे 1 ढंग का साड़ी भी नहीं दिलाए और बड़ी – बड़ी हांकते बैठे रहते हो।बरखा के पति श्यामलाल सन्न रह गया।इतने में बहुरानी कला आई कहा कि बाबू जी रहने दो आप बोल दिए इतना ही काफी है। आपके मुंह में घी- शक्कर।मुझे अब कुछ नहीं चाहिए आपके प्यार और बेटी की तरह दुलार काफी है बाबूजी।इधर बरखा और श्यामलाल काफी देर तक आपसी बहस कर रहे थे।
श्यामलाल के बेटा बड़े डॉक्टर थे ;पीड़ितों और रोगियों की सेवा करते रहते है उनको घर वालों की बहसबाजी में जरा सी दिलचस्पी नहीं है।
दफ्तर से घर लौटते ही सारी बातें बरखा ने अपने बेटे को बताई।
डॉक्टर साहब हंस पड़े।
कला अपने पति की इंतजार में घर के दहलीज में ही खड़ी रहती थी।डॉक्टर साहब के घर आते ही उनके बैग अपने हाथ में रख लेती और उनके हाथों में हाथ डाल घर तक लाती।रात्रि के समय था,8 बज रहे थे।
डॉक्टर हाथ मुंह धोते है ,कला उनके लिए खाना की तैयारी करती है।सब बैठकर खाना खाते है मेज़ पर।
डॉक्टर साहब के बाबूजी फिर कहने लगे वही बात 5 एकड़ खेत कला के नाम लगाऊंगा
डॉक्टर अपने पत्नी को देख मुस्कुराने लगा।
और पत्नी भी।
फिर से कला
बोली नहीं चाहिए बाबूजी।
धनतेरस त्यौहार के दिन सोना खरीदना शुभ होता है डॉक्टर अपने पत्नी के साथ बाजार को चले।कला सोने के सामान लाई कंगन,अंगूठी,मंगलसूत्र, कान के बाली आदि साथ में नए-नए सामन मिठाइयां आदि।
दोनों घर पहुंचते है।कला सभी गहने सासू मां बरखा को सौंप दिए कहे कि “आपको जो पसंद हो पहन लो।”सासू मां बहुत खुश_ हुई।यह भाव देख डॉक्टर भी भाव -विभोर हो गया।बाबूजी के लिए भी कपड़े लिए थे ।
ये सब बहु रानी कला की कलाकारी थी।घर को खुशी के माहौल में
ढालने में बहु रानी कसर न छोड़ी थी।बहु स्वस्थ माहौल में रहती रही कुछ दिन बाद गर्भवती हुई।7वें माह में गोदभराई का कार्यक्रम रखे लड़की की मां बाप आए त्यौहार जैसा माहौल गांव के लोग और सब रिश्ते नाते एकजुट हुए।श्यामलाल बोले ऐसे बहु पाकर हमारे छाती चौड़ी हो गया है।यह सुनते ही कला के माता पिता गौरव महसूस करते है और अपने बीते दिनों में कला की व्यवहार,मृदुभाषी शिक्षा ,वाणी संयम,परंपरा,
आज्ञाकारी होने के बारे में जानकारी कला के पिता द्वारा चर्चा के दौरान बताया ।
घर परिवार में खुशी की माहौल तब आ पड़ी जब उस घर में नन्हीं परी ने जनम लिया तो इतनी प्यारी हुई कि सब उसे निहारते रहे नाम रखे पलक।तभी श्यामलाल ने कहा 5 एकड़ इनके नाम करता हूं और सच में कर दिया।किसी को एतराज भी नहीं हुई।सभी खुश हुए।एग्रीमेंट में साइन हुई,पलक तो अभी अबोध थी इसलिए माता पिता नॉमिनी बने। पलक और दादा जी के साथ तालमेल काफी अच्छा था ,पलक रोज स्कूल जाते दादा जी रोज स्कूल छोड़ने जाते ,पास में स्कूल थी और वापस लाते बहुत अच्छा परिवार था इतने में पलक के दादा जी चल बसे घर में शोक का माहौल था लेकिन उसके चर्चे ने कई सालों तक सबके हृदय में चलते रहे।बसे रहे।
(लेखक इस कहानी के माध्यम से यह कहना चाहते है कि वर्तमान समय में एकल परिवार ने भारतीय परंपरा को समाप्त किया है बुजुर्गों के प्रति सम्मान भाव घटा है,घर परिवार में बहुओं की आधुनिक जीवन शैली ने संकट में डाल रखा है।कला जैसे चरित्र वाली बहु और पलक के दादा जी जैसे दानशीलता की अपेक्षा की जाती है )
कहानीकार व लेखक संतोष कुमार मिरी रायपुर छत्तीसगढ़