प्रकृति ही सहज सरल है कोई व्यक्ति खास कैसे हो सकता है।
प्रकृति ही सहज सरल है:कोई व्यक्ति खास कैसे हो सकता है?
संतोष कुमार मिरी ” विद्या वाचस्पति”
छत्तीसगढ़_व्यापक सत्ता के बात करें तो इससे कोई अनभिज्ञ नहीं सभी अवस्थाएं इसी व्यापक सत्ता में समाहित है।इसीलिए सारा प्रकृति के नजारे ,वैभव,ऐश्वर्य जिसे ईश्वर ने रचा है बखूबी पारगामी और पारदर्शी है।कोई एक मनुष्य कैसे विशेष हो सकता है।अहंकार वश कोई यह स्वीकारता है कि मैं खास हूं पर यह सच की सभी मानव सहज और सरल रूप से विद्यमान है।कोई विशेष नहीं हैं।मानव जब जागृति की ओर होता है तो उसके पास समझ की दृष्टिकोण होती है जैसे दृष्टिगोचर और ज्ञानगोचर।यह भी सच है कि हर व्यक्ति जो पढ़ा लिखा है वह अपने आपको ज्यादा होशियार समझता है पर है नहीं।
मानव जागृत होता है तो सब एक परिवार जैसा दिखलाई पड़ता है
सर्व मानव के सुख,शांति,संतोष,
आनंद में बढ़ोतरी के लिए अपना अमूल्य योगदान देता है।
पर यह सब कहा से सीखता है? प्रकृति से।हां यथार्थ है कि प्रकृति सबसे बड़ा गुरु है।
इस देश में महान दार्शनिक पैदा हुए,स्वामी विवेकानंद ,संत कबीर,गुरुनानक,गुरु घासीदास,गुरु रैदास,गुरु ओशो रजनीश आदि
ये सभी तर्कवादी थे ज्ञान विज्ञान की सत्यता को परखा,समझा और जाना।
इसी क्रम में एक प्रमाणित गुरु हुए अग्रहरि नागराज जी जिन्होंने मध्यस्थ दर्शन के अस्तित्व और सह अस्तित्व मूलक समाज की स्थापना की।
ज्ञात हो कि मैने स्वयं उनके समक्ष उपस्थित होकर 1 वर्षीय अध्ययन शिविर मानवीय शिक्षण शोध संस्थान अछोटी जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ प्रबोधक के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त किया।इनके ज्ञान से प्रभावित होकर समस्त प्रकार के विभागीय अधिकारी ,कर्मचारीगण,देश दुनिया भर के लोग सहज ही मध्यस्थ दर्शन के शिक्षा प्राप्त करने छत्तीसगढ़ आ जाते है।
निश्चित तौर पर आज जो समाज की दशा और दिशा खराब हो रही है उन सबको मध्यस्थ दर्शन की शिक्षा दी जानी चाहिए।इसे देश के तमाम स्कूल कॉलेज में पढ़ाया जाना चाहिए।
अन्यथा व्यक्ति अभ्यास पूर्वक कोई पद प्राप्त कर ले तो एक साधारण व्यक्ति से सीधे मुंह बात नहीं करता और अपने आप को अहंकार वश सुपीरियर समझते रहता है।
(लेखक मध्यस्थ दर्शन के प्रबोधक,अनुयायी और अग्रहरि नागराज के शिष्य रहे हैं।)
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर संसार के समस्त गुरुओं को सादर प्रणाम और यह आलेख समर्पित करता हूं।