गुरु को सुमिरन करूं जी
गुरु को सुमिरन करूं
गुरु को सुमिरन करूं
कि लगा दे बेड़ा पार
इस पार से उस पार करो गुरु जी
आप ही हो खेवन हार।
मैं अबोध बालक हूं साहेब
आशीष देकर हमें तार।
भूल चूक माफ कर
हमको सही रास्ता दिखाओ बार-बार।
विकट परिस्थिति से उबारो ,
मेरे जैसे कई भ्रमित मानव को सुधारो।
आप हो पुरुष चीर अवतारी,
आप के गुण- गान करें सब नर-नारी।
जग में प्रथम गुरु जनम देने वाले माता- पिता,
द्वितीय गुरु जी आप है.
जो करते हो ज्ञान के प्रकाशा।
तृतीय में सहज सरल प्रकृति है ,
जिसमें बसे है विधाता।
कविराज संतोष कुमार मिरी “विद्या वाचस्पति”
नवा रायपुर छत्तीसगढ़