स्वयं को जानना है तो अपने अंदर जाओ
स्वयं को जानना है तो अपने अंदर उतर जाओ:विद्या वाचस्पति संतोष कुमार मिरी
छत्तीसगढ़_भारत देश में अनेक संत,गुरु,महात्मा, सन्यासी,तपस्वी हुए सभी ने अपने भीतर उतर कर प्रयोग किया।देखा कि बाहरी जगत में जो आनंद है वह भीतर स्वयं के सहज ही विद्यमान है।बाहर प्रकाश है भीतर भी प्रकाश है।बाहर शीतलता है भीतर भी शीतलता है।मानव कल्पनाशीलता के कारण इधर उधर भटकता है सही और गलत का निर्णय,सही निर्णय स्वयं को जानने के बाद मिलती है।
आज्ञा चक्र में तो इतनी प्रकाश है कि आप खुद ही प्रकाशित हो जाएंगे साथ ही ऐसा लगता है कि इस जगत में प्रकाश ही प्रकाश है।किंतु जब सहस्त्रार में प्रवेश होते ही बने रहने,होने की सार्थकता,मानव जीवन के मूल्य ,मानव इस दुनिया के सुंदर कृति,हर एक मानव में अखंड ऊर्जा और इसी आधार पर हर मानव एक है।जो मेरे भीतर घट रहा है ओ सभी मानव के भीतर घट सकता है बशर्ते कि शुद्ध,भाव,पवित्र भाव,मित्र भाव, अहो भाव में रहना होता है।
तब जाकर मानव उपयोगी कार्य,व्यवहार,वक्तव्य,
दर्शन आदि प्रस्फुटन होता है और अनवरत मानव कल्याण के लिए धरोहर बन जाती है जिसे सहेज कर रखना नितांत आवश्यक है।बोधगम्य मार्ग सुगम हो जाता है इससे प्रत्येक मानव में जागृति संभव हो पाता है जीवन सफल होता है।
समाधानित मानव हर कार्य खुश होकर उत्सवित होकर करने लगता है।यही कारण है कि सभी बोधी व्यक्ति का कार्य अनुसरणशील होता है।अनुकरणीय होता है।