सामर्थ रहे न रहे काम तुझे करना होगा:
कहानी:सामर्थ रहे न रहे काम तुझे करना होगा
संतोष कुमार मिरी
विद्या वाचस्पति
रायपुर छत्तीसगढ़अजी! सुनती हो बरखा आज अपने हाथों से मुझे खाना नहीं खिलाओगी क्या?पति श्यामलाल ने पत्नी बरखा को आवाज लगाया। इतने में तपाक से बरखा बोल पड़ी कही कि “उसी हाथ में मारते थे मुझे इसीलिए तुम्हारे हाथ लकवा से ग्रसित हो गया है !”श्यामलाल अतीत में खो गया और घबराहट से इधर उधर झांकने लगा।बरखा बड़बड़ाते हुए खाना खिलाती है श्यामलाल खाता है।
श्यामलाल कहता है कि ये हाथ तुझे मारा पीटा ये याद है बरखा तुझे कितना प्यार किया वे सब याद नहीं
बरखा सन्न रह गई।
बरखा अपने पति के हाथ में सरसों का तेल मालिश करती है।
श्यामलाल आगे बोलता है अभी मेरी बाते अधूरी है पूरी सुन सकेगी न हां।श्यामलाल कहता है देखो बरखा काम तो तुझे करना पड़ेगा चाहे खुश होकर कर चाहे चिकचिक बाजी करके कर।क्योंकि जब तू छत से गिरी थी तो मैने तुझे उठाया अस्पताल में इलाज करवाया तभी तो ठीक हो न।आज अब मुझे तुम्हारी जरूरत है बरखा !तो तुम ताना मारती हो।
दोनों एक दूसरे के सम्मुख बैठ प्यार भरी नजरों से निहारते रहते है और एक अखंड प्रेम के भाव में सहज स्वीकार के साथ सब काम करते है।
कुछ दिन बाद बरखा भी करते करते थक तो गई पर स्वीकार्यता का पूर्ण भाव बना रहा।
जमीन को एक छोटी लकड़ी से कुरेदते हुए एकाएक कह उठती है मेरे कमर दर्द से भर गया है। सिर भारी भारी लग रहा है।हाथ पैर सुन्न हो रहा है।
अब ऐसा है कि हाथ पैर चले न चले काम तो करना पड़ेगा।अब करेगा कौन?
दोनों के माथे पर प्रश्नचिन्ह उभर कर बार बार आने लगा।
बच्चे सभी विदेशों में रहते थे। माता पिता की कभी सुध न लिए थे।
किसी ने वृद्धाश्रम के संचालक को सूचना दी कि दो अति वृद्ध व्यक्ति बहुत असहाय और अचेत पड़े है।आश्रम के समाज सेवी द्वारा समुचित इलाज कराया और अपने आश्रम में ले गया।इतने में श्याम लाल ने अपने सारे जमीन जायदाद आश्रम के नाम दान कर दिया।
बहुत सारे वृद्ध व्यक्ति आश्रम में रहते थे।
योग,खेल,चुटकुले से उन सब के दिन की शुरुआत होती है। जीवन अमूल्य है ।
जीना तो पड़ेगा।