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21 Jul 2025 · 5 min read

“चुप्पी की गठरी”

रात के कोई आठ बजे होंगे, जब मम्मी के मोबाइल पर एक कॉल आया।
नंबर अनजान था, लेकिन आवाज़ जानी-पहचानी लगी। गांव में नानी के घर के बगल में रहने वाले रामाकांत मामा थे।
उन्होंने घबराई हुई आवाज़ में कहा –

“दीदी, आप आ जाइए, चाची गिर गई हैं… और अब उठ नहीं पा रही हैं। कपड़ों में पेशाब भी कर दिया है।”

सुनते ही मम्मी का चेहरा जैसे जम गया।

उस रात हम नहीं जा सके। गांव दूर था, रास्ता सुनसान और अनजान लोगों के भरोसे मम्मी को भेजना मुमकिन नहीं था। लेकिन अगली सुबह, बिना समय गंवाए, हम स्कूटी उठाकर गांव के लिए निकल पड़े।
तेज़ धूप में गेहूं के खेत सरसराते थे और रास्ते में धूल उड़ती रही। मम्मी की आंखों में चिंता का बादल घिरा था — और मेरी पकड़ स्कूटी के पीछे कसती जाती थी।

नानी गांव में अकेली रहती थीं। मामा लोग तो पूरे परिवार समेत दिल्ली जा बसे थे, और पीछे बची थीं बस नानी — उम्र के आखिरी पड़ाव पर, पर अपने सारे काम खुद करनेवाली।

घर पहुंचे तो नानी खटिया पर पड़ी थीं। चेहरा थका हुआ था, पर आंखें जैसे कुछ कह रही हों। उन्होंने हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन वो मुस्कान दर्द से भरी थी।

“कैसे हुआ अम्मा ये सब?” मम्मी ने उनका माथा सहलाते हुए पूछा।

नानी धीरे से बोलीं —
“आंगन में गेहूं फैले थे, बंदरों का झुंड आ गया। मैं दौड़कर भगाने गई तो वहीं आंगन में धड़ाम से गिर पड़ी। एक पांव जैसे पत्ता हो गया हो, हिलता ही नहीं।”

हमने गांव के एक डॉक्टर को दिखाया, जिसने कुछ दवाइयां थमा दीं। पर कोई असर नहीं हुआ। फिर शहर के एक हड्डी रोग विशेषज्ञ के पास ले गए। उन्होंने एक्स-रे देखकर सिर हिलाया —
“कूल्हा टूट गया है, ऑपरेशन कराना पड़ेगा।”

मम्मी की आंखें भर आईं। उन्होंने वहीं से मामा को फोन किया और पूरी बात बताई।
मामा की आवाज़ सुनाई दी, पर उनके बोल थोड़े परे थे। वो सुन तो रहे थे, लेकिन भीतर से जुड़े नहीं लगते थे।
मामी से बात हुई — तो वो एकदम साफ़ थीं —

“हम एक रुपया नहीं लगाएंगे, और न उन्हें देखने आऊंगी ।”

मम्मी ने विनती की —
“तुम सिर्फ अस्पताल में रह लो, पैसे हम देख लेंगे। बस मां को अकेला मत छोड़ो।”

मामी ने साफ इनकार कर दिया। गांव में मामा की चर्चा होने लगी — कि बेटा होकर भी मां की सुध नहीं ले रहा।
शायद इसी बदनामी से डरकर, और साथ ही ये भय भी कि कहीं मम्मी नानी की संपत्ति अपने नाम न करवा लें, मामा कुछ दिनों बाद गांव आए और नानी को दिल्ली ले गए।
उनके आने में अब स्नेह नहीं, स्वार्थ दिख रहा था।

मम्मी ने बहुत समझाया नानी को —
“मत जाओ अम्मा, जब वो लोग यहां नहीं कर रहे तो वहां क्या करेंगे? वहां तुम्हारा ध्यान रखने वाला कोई नहीं होगा। यहां रहो, मैं संभाल लूंगी।”

नानी ने बस एक बात कही —
“बेटा है मेरा… जीवन भर नहीं किया, अब करेगा।”

मम्मी चुप रहीं। शायद उस चुप्पी में वो सारी बातें थीं, जो एक बेटी होकर मां को कह नहीं सकती।

दिल्ली में वही हुआ, जिसका डर था।

नानी को दिन में बस एक वक्त खाना मिलता। ठंडी दिल्ली की रातों में उन्हें एक फटी हुई शॉल थमा दी गई। तकिए तक से हवा आ रही थी।

एक दिन उन्होंने हिम्मत कर मामी से कहा —
“थोड़ी देर बैठ जाओ, किसी से कहो तो पानी ही दे दे…”

मामी झुंझलाकर बोलीं —
“जिंदगी भर तो तुम बेटियों के पीछे मरी हो। जो कुछ था, सब उन्हीं को दे दिया। अब हम क्यों करें तुम्हारी सेवा? हमारे लिए क्या छोड़ा जो बदले में हमसे उम्मीद हो?”

नानी कुछ पल चुप रहीं। फिर हल्की सी सांस लेकर बोलीं —
“तुम्हारे बप्पा को मरे बरसों हो गए। गेहूं बेचकर जो थोड़े-बहुत पैसे आते हैं, उसी में मेरा खर्च ढंग से नहीं चलता था… तुम्हें क्या देती, जब खुद के लिए ही बचता नहीं था…”

मामी बिना कुछ बोले वहां से उठ गईं। उस दिन के बाद नानी और भी अकेली हो गईं।

उन्होंने किसी तरह मम्मी को फोन किया — धीमे स्वर में बस इतना कहा,
“बेटी, मुझे यहां से ले जा…”

मम्मी की आंखें भर आईं। हमने बिना किसी को बताए टिकट करवाया और दिल्ली पहुंच गए।
नानी को देखकर दिल कांप उठा। वो अब नानी नहीं लगती थीं — बस एक थकी हुई, टूटी हुई देह, जो अब रिश्तों का बोझ नहीं उठा पा रही थी।

जब हमने नानी को वापस अपने साथ ले जाने के लिए कहा , तो घर में जैसे हलचल सी मच गई।

मामा बाहर टहलने निकल गए, और मामी का चेहरा जैसे अंगारे उगलने लगा। नानी की गठरी बांधते वक्त उन्होंने नानी को घूरते हुए कहा —

“बुढ़िया! जा तो रही है, लेकिन याद रख — अब कोई तुझे दोबारा लेने नहीं आएगा। तेरे कीड़े पड़ेंगे वहीं, और मरेगी तो देखने वाला भी कोई नहीं होगा!”

नानी ने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर एक जानी-पहचानी चुप्पी उतर आई — वो चुप्पी जो आत्मसम्मान को तोड़ नहीं पाती, बस अपने भीतर समेट लेती है।

लेकिन असली बात अभी बाकी थी।

मामा-मामी को अंदर ही अंदर यह डर खाए जा रहा था कि कहीं नानी वापस जाकर अपनी ज़मीन बेटियों के नाम न करवा दें।

नानी को दिल्ली से विदा करने के ठीक पहले, मामा ने एक कोरा कागज निकाला और ज़बरदस्ती नानी से अंगूठा लगवा लिया। मामी ने कहा —

“जाओ जहां जाना है, लेकिन खेत अब हमारे नाम हैं। अब यहां किसी का मुंह मत ताकना!”

मैं सोच रहा था, “जो एक रोटी देकर अहसान जताते थे, वही अब ज़मीन के कागज़ भी हथियाना चाहते थे।”

मैं यह सब देख रहा था। कुछ कहने को हुआ ही था कि मम्मी ने धीरे से मेरा कंधा थाम लिया और फुसफुसाईं ,
“बस देख लेते है कि ये लोग कितना नीचे जा सकते है।”

हम नानी को अपने पास ले आए। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। जब उन्हें फिर से डॉक्टर को दिखाया गया, तो उन्होंने साफ कह दिया —
“अब ऑपरेशन नहीं हो सकता। बहुत समय बीत चुका है, अब रिस्क ज़्यादा है।”

मम्मी की आंखों से आंसू झरने लगे। वो चाहकर भी नानी का इलाज समय पर नहीं करवा पाईं।
उस दिन उन्होंने बस इतना कहा —
“काश अम्मा मेरी बात मान ली होती…”

मुझे याद है ट्रेन से लौटते वक्त नानी मम्मी का हाथ थामे बैठी थीं। बाहर रात थी — भीतर सन्नाटा।

काफी देर चुप रहने के बाद उन्होंने धीमे से कहा —

“जब तू पैदा हुई थी न, तो मैं सोचती थी कि एक और बेटा चाहिए था… तू न होती तो अच्छा होता। पर देख… आज तू ही मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गई। जो बेटा जीवन भर नहीं लौटा, वो आज भी पीछे ही रह गया।”

मम्मी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने नानी के हाथ पर अपनी हथेली रख दी।
बाहर ट्रेन सरसराती रही — और भीतर एक मां-बेटी की टूटती-झड़ती दुनिया फिर से थोड़ा जुड़ने लगी।

जिन रिश्तों से उम्रभर उम्मीदें की जाती हैं, वो कभी-कभी सिर्फ नाम के रह जाते हैं।
लेकिन एक बेटी — जो शायद कभी ‘कम’ समझी जाती थी — वही आख़िरी वक्त में सबसे बड़ी ढाल बनकर खड़ी होती है।
ममता की छाँव सिर्फ जन्म देने में नहीं, उसे निभाने में होती है।

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