गांव तीर्थ सा प्यारा
शहर भी मुझको प्यारा लगता, ह्मारा गांव सबसे न्यारा है।
होता नहीं है भेद मानव में, गांव तीर्थ सा मुझको प्यारा है॥
शहरों की बड़ी हवेलियों में,
कैसे – कैसे मानव बसते है।
गांव की टुटी झोंपड़ियों में,
जीवंत मानव सदा रहते हैं।
पशु, पक्षी और वृक्ष, वनलता का, रहता निशिदिन बसेरा है।
होता नहीं है भेद मानव में, गांव तीर्थ सा मुझको प्यारा है॥
जिजीविषा की लालसा में,
हम कहाँ से कहाँ आ गए।
पेट की आग तो बुझ गई,
अपनत्व के लिए तरस गए।
दिनकर कि पहली शीतल प्रकाश से, होता जहाँ सवेरा है।
होता नहीं है भेद मानव में, गांव तीर्थ सा मुझको प्यारा है॥
पहनावे से सभ्य सा लगते,
होते नहीं वैसा वो भितर से।
होठों पर मुस्कान सजाकर,
फिरते रहते निज मतलब से।
बसता नहीं ऐसा ढ़ोंगी मानव, मानवता का जहाँ बसेरा है।
होता नहीं है भेद मानव में, गांव तीर्थ सा मुझको प्यारा है॥
न लोगों का व्यवहार सही,
न सभी की मधुरिम बोली।
गले मिलते सब लोग यहाँ,
बना के अपनी सुरत भोली।
समरसता, एकजुटता और सौहाद्र का, समाज में नहीं कोई घेरा है।
होता नहीं है भेद मानव में, गांव तीर्थ सा मुझको प्यारा है॥
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