प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के धनी :बना दास जी
प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के धनी :बना दास जी
हमारे भारत में एक ऐसी महान विभूति ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के धनी बना दासजी, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले के अशोकपुर गाँव में1821 वीं ईस्वी में हुआ था।
उनके पिताजी का नाम गुरदत्त सिंह था। उनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उन्होंने भिनका राज्य की सेना में नौकरी कर ली और लगभग सात वर्ष तक वहाँ रहे। उन्हें अपनी नौकरी से लौटे हुए अधिक दिन न हुए थे कि इनके पुत्र का अकस्मात निधन हो गया। कहा जाता है कि पुत्र के शव के साथ ही 1851 की कार्तिक पूर्णिमा को ये अयोध्या चले गए और फिर वहीं पर राम के भक्त होकर रहे। इनका नाम तुलसीदास के बाद महान साहित्यकारों ,कवियों और रचनाकारों में एक महान विभूति के रूप में उत्कृष्ट काव्य ज्ञाता रूप में जाना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि उनके सुखमय जीवन में उस समय वज्रपात हो गया जब उनके पुत्र की 12 वर्ष की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई। शोक में डूबे हुए विचलित मन: स्थिति में परिजनों के साथ बालक का शव लेकर अयोध्या आए जहां अंतिम संस्कार के बाद फिर घर वापस नहीं लौटे।
बनादास जी के दीक्षागुरु शैव योगिमहात्मा लक्ष्मण वन थे। इन्हीं के सान्निध्य में रहकर इन्होंने अध्यात्म की खोज की जहां सियाबल्लभ शरण के सानिध्य में भी रहे। सियाबल्लभ शरण को इनका साधना गुरु कहा जाता है।
यही पर ये श्री रामजी के परम भक्त बन गये और उन्हीं को अपना जीवन समर्पित करते हुए उन्होंने 60 ग्रंथों की रचना की जिनका उल्लेख हमें मिलता है। अल्पायु में पुत्र की मृत्यु से इनका मन सांसारिक जीवन से उठ चुका था। और वह अपने विचलित मनोस्थिति के साथ अयोध्या में ही रहने लगे। इन्होंने गृहस्थ जीवन को ठुकरा कर सन्यासी रूप धारण कर लिया। पुत्रशोक से संतृप्त हृदय को इन्होंने रघुवीर को समर्पित कर दिया। सूखा चना चबेना खाकर सरयू का जल ग्रहण कर ये साधना में लीन हो गये और अनवरत 14 वर्षों की साधना के बाद उन्हें भगवान राम सीता के युगल स्वरूप में दर्शन कर उन्हें प्रभु की असीम अनुकम्पा मिली। भगवन की प्रेरणा से वे साहित्य की रचना कर भगवान की महिमा का गायन करने लगे और भगवान की इसी असीम कृपा के कारण उन्होंने चौंसठ ग्रंथों की रचना कर डाली।
धन,ऐश्वर्या, लोकप्रियता का लोभ उन्हें अयोध्या के प्रति प्रेम से डिगा न सका।उनकी कुछ प्रतिष्ठित पंक्तियाँ भी हैं जिनमें”एक भरोसो राम को और न आस भई झीन”
इन पंक्तियों से उनके हृदय में विचलित मर्म का ज्ञान होता है। सिर्फ अब राम का ही भरोसा है अगर वो भी मुझसे छिन गया या उस पर से विश्वास उठ गया तो मैं किस भरोसे अपनी जिंदगी का गुजर बसर करूगा। ये ज़िंदगी भगवान के चरणों में समर्पित है। बना दास जी पढ़े लिखे तो नहीं थे? लेकिन गोस्वामी तुलसीदास के बाद रचना शैलियों की विविधता पर काव्य सौष्ठव के विचार से ये राम भक्ति शाखा के अन्यतम कवि ठहरते हैं। इनकी रचनाओं में निर्गुण पंथी सूफ़ी तथा रीतिकालीन शैलियों का प्रयोग एक साथ ही मिलता है। किन्तु प्रतिपाद्य सबका राम भक्ति ही है। राम के प्रति इनका अनन्य भाव हमें इन रचनाओं में देखने को मिलता है।
आगरा, गोरखपुर , मगध विश्वविद्यालय के छात्रों ने इनके काव्य को शोध कार्य भी किया है। भक्त कवि बनादास ने चौंसठ ग्रंथों में उनके विस्मरण सम्हार ग्रंथ पर विश्वविद्यालय व काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा उनके आध्यात्मिक व साहित्य पर शोध किया गया है।
संत जी का 1892 इस्वीं में लखनऊ के नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित उभय प्रबोधक रामायण भक्तों एवं विद्वानों में लोकप्रिय हुआ।
बना दारजी
जीवन के 71 वें बसंत की आयु पूरी करके 1892 ईस्वी में उन्का पर लोकागमन हुआ।
उनका बहुमूल्य साहित्य विलुप्त हो रहा है। अयोध्या में तुलसी उद्यान के पीछे महात्मा बनादास द्वारा स्थापित पुराना आश्रम व अशोकपुर में पूज्य संत देवरहा बाबा द्वारा लोकार्पित स्मारक की देखभाल उनकी सांतवी पीढ़ी के वंशज अंकित सिंह कर रहे हैं। उनकी आकांक्षा है कि अवध विश्वविद्यालय में व मां पटेश्वरी विश्वविद्यालय की ओर से संत वनादास ने आध्यात्मिक साहित्य धरोहर को सुरक्षित संरक्षित करने के लिए उनके जीवन व साहित्य कृतित्व पर शोध की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
बनादास जी के इस साहित्य को संजोकर रखना यह हम सभी भारतीयों के लिए बहुत गौरव और सम्मान की बात है और हम सभी को मिलकर इस पर कदम उठाना चाहिए और सरकार का ध्यान भी इस ओर आकर्षित कराना चाहिए ताकि उनकी विलुप्त हो रही कृतित्वो को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ी को उसे अवगत कराया जा सके।
ये हमारी ऐसी भारतीय सांस्कृतिक धरोहर है जो हमें ऐसे महान रचनाकारों के बारे में,
हमारे धर्म के बारे में हमारी, संस्कृति के बारे में।सभी को अवगत कराती है।
हरमिंदर कौर, अमरोहा