शीर्षक: नीलकंठ का द्वार
शीर्षक: नीलकंठ का द्वार
डम् डम डमरू बाजे तुम्हारा
बम बम भोले का लगता नारा
चारों तरफ भक्त है झूमे
जैसे भाँग का पिला दिया हो प्याला।।
कंकड़ पत्थर सब बने हैं फूल
शिवजी के मय में सब गए है भूल
देखो आई भोले की सवारी
झूम झूम कर करे सब तैयारी
तन मन हो जिसकी ज्वाला
कंठ में पहने सर्पों की माला
जटाओं में बहती गंगा की धारा
उस पर चंद्रमा ने भी लिया सहारा
भोले का गुस्सा बारिश जैसा
पल में आता पल मैं जाता
तभी तो सावन में
भोले का जन्मदिन आता।
कोई गढ़ गंगा,कोई हरिद्वार
न छूटे नीलकंठ का द्वार
कांधे पर उठाए भोले की कांवड
भरने चले हैं देखो अमृत का प्याला
भूखे- प्यासे देखो
सबदौड़ रहे हैं
भोले की धुन में सब
भोले भोले बोल रहे हैं।
न जाने कब से थे आस लगाए
इस बार के कांवर हम लाएं।
माँग रहे हैं सब वर भोले से
भोले सब पर अपना आशिर्वाद बनाए।
हरमिंदर कौर, अमरोहा( यूपी)