सेकुलर फ़िरक़े ने उसकी नाक बचाली
ग़ज़ल
मैं पैदल था उसने अपनी कार निकाली
पर मेरी अय्याशी की तस्वीर बना ली
सांचे में गर ढल सकता तो मैं ढल जाता
पर जाने क्यों उसने मेरी नाप बना ली
फ़िर्क़ा-वाराना थी उसकी सब करतूतें
सेकुलर फ़िरक़े ने उसकी नाक बचाली
सेकुलर ने हर मज़हब के जोड़े कट्टरं
और फिर दावा ठोंका ख़ुल्ली जगह बनाली
इक रस्ते पर चले सदा, था उसका दावा
लेकिन उसकी बात हमेशा थी दो-नाली
-संजय ग्रोवर