*लेख:"ज़िंदगी का अर्थ समझो: खुद को व्यर्थ मत होने दो"*
ज़िंदगी का अर्थ समझो: खुद को व्यर्थ मत होने दो
“कुछ भी व्यर्थ गंवाना, किंतु कभी भी खुद की ज़िंदगी व्यर्थ न गंवाना।”
ये शब्द हमें जीवन की उस सच्चाई की ओर ले जाते हैं, जिसे हम अक्सर रोज़मर्रा की भागदौड़ में भूल जाते हैं।
जीवन में नुकसान होना स्वाभाविक है। कभी पैसे का, कभी समय का, कभी रिश्तों का या कभी अवसरों का। हम इंसान हैं, और इंसान गलतियाँ करता है। कुछ फैसले गलत होते हैं, कुछ हालात हमारे वश में नहीं होते।
पर अगर इन सबके बीच हम खुद को खो दें , अपनी पहचान, अपनी इच्छाएँ, अपने स्वप्न , तो यह सबसे बड़ी हानि है।
क्या होता है ‘ज़िंदगी का व्यर्थ होना”
ज़िंदगी का व्यर्थ होना मतलब है,जब हम केवल दूसरों की अपेक्षाओं में जीते हैं, पर अपने मन की आवाज़ नहीं सुनते।
जब हम दिन-रात व्यस्त तो रहते हैं, पर संतुष्ट नहीं होते।
जब हम खुद को इतना थका देते हैं कि हमारे अंदर कुछ नया सोचने, महसूस करने या जीने की ऊर्जा ही नहीं बचती।
जब हमारा जीवन ‘जिम्मेदारी’ तो बनता है, पर ‘जीवन्तता’ नहीं बचती।
यह धीरे-धीरे होता है। हम महसूस भी नहीं करते और एक दिन भीतर से खाली महसूस करने लगते हैं , बिना किसी स्पष्ट कारण के।
क्यों ज़रूरी है खुद को व्यर्थ होने से बचाना?
क्योंकि यह जीवन अनमोल है।
हमें जन्म लेना मिला है , एक सोचने, महसूस करने और कुछ बड़ा करने वाली चेतन शक्ति के रूप में।
अगर हम इस जीवन को सिर्फ खाने, सोने और कुछ सामाजिक रस्में निभाने में गँवा दें, तो यह उस आत्मा का अपमान है जो हमारे भीतर है।
हर इंसान के भीतर कोई “अधूरी कविता”, “अनकहा गीत”, “अपूरी उड़ान” छुपी होती है।
यदि वो बाहर न आ सके, अगर वो बस भीड़ में दब जाए, तो वो एक खोया हुआ जीवन कहलाएगा ,भले ही समाज उसे सफल माने।
क्या करना चाहिए?
1. रोज़ अपने आप से जुड़ें।
थोड़ा समय खुद को दें। यह जानने की कोशिश करें कि आप वाकई क्या चाहते हैं।
2. अपने अंदर के छोटे-छोटे सपनों को जीवित रखें।
भले ही आप दिनभर नौकरी करें, परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाएँ, लेकिन दिन का एक कोना सिर्फ अपने लिए बचाएँ।
3. ‘न’ कहना सीखें।
हर ज़िम्मेदारी को ओढ़ लेना समझदारी नहीं। खुद की शांति और ऊर्जा की रक्षा करें।
4. रचनात्मक बनें।
कुछ नया सीखें, लिखें, गाएँ, बनाएं। अपने भीतर की रचनात्मकता को समय दें , यही आपके अस्तित्व का रंग है।
5. अपने डर को पहचानें और उसका सामना करें।
अक्सर हम डर की वजह से ही जीवन को छोटा जीते हैं। खुद को सीमित न करें।
अंत में ,खुद से एक वादा:
हर सुबह आइने में खुद से एक वादा करें ,
“आज मैं भले ही कुछ खो बैठूँ, समय या पैसा या किसी का साथ, पर मैं खुद को नहीं खोने दूँगा।
मैं अपनी आत्मा की पुकार को सुनूंगा, और ज़िंदगी को सच में जियूँगा।”
ज़िंदगी एक बार मिलती है।
इसे सिर्फ जीना काफी नहीं, पूरी गहराई से जीना ज़रूरी है, अपने भीतर की चमक के साथ, अपने मकसद के साथ, और अपने अस्तित्व के सम्मान के साथ।
दुनिया जो भी कहे, हालात जैसे भी हों ,
“कुछ भी व्यर्थ गंवाना, किंतु कभी भी खुद की ज़िंदगी व्यर्थ न गंवाना।”
©® डा निधि श्रीवास्तव “सरोद”