दोहा त्रयी. . . . शृंगार
दोहा त्रयी. . . . शृंगार
शोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।
पावस रुत में फिर कहाँ, तन को रहता चेत ।।
अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल रात ।
तीव्र वृष्टि के दौर में, खूब हुए उत्पात ।।
बंधन टूटे लाज के, टूटी हर दीवार ।
मौन समर्पण से हुआ, प्रेम लोक साकार ।
सुशील सरना / 20-7-25