एक कप चाय हो जाती
यह धुंधला धुंधला सा आसमां और सर्द शाम,
काश, तुम्हारे साथ एक कप चाय हो जाती।
कुछ तो बर्फ़ पिघलती हमारे रिश्ते की,
ख़ुशनुमा फिर एक शाम हो जाती।
ढह जाता तन्हाईओं का उदास खंडहर,
गुलिस्तां की हर कली फिर गुलाब हो जाती।
कोहरे की घनी चादर से झाँकती आँखे,
शरारत ख़ुद करतीं फिर शर्म से लाल हो जातीं।
कभी तो आया होगा तुम्हे भी ये ख़्याल,
पास बैंठे और राज-ए-दिल की बात हो जाती।
गुलाबी ठंड और गर्म चाय की चुस्कियाँ,
ख़ामोश निगाहों से सब हाल कह जातीं।
काश, तुम्हारे साथ एक कप चाय हो जाती।।
#स्वरचित एवं मौलिक रचना
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’