रह जाता कोई मोल नही
नफ़रत का बीज अंकुरित होकर
जब बन जाए विशाल वृक्ष
तब टूटे रिश्ते सिलने का
रह जाता कोई मोल नही।
विष बुझे व्यंग्य वाणों से
जब अंतर्मन छलनी हो जाए
फिर पीछे क्षमा याचना का
रह जाता कोई मोल नही।
फसल सूख कर चौपट हो
और स्वप्न कृषक के बिखर जाएँ
तब होने वाली घनघोर वृष्टि का
रह जाता कोई मोल नही।
उपचार समय पर नही मिला
और टूट चुकी हो जीवन लय
फिर जीवन देने की कोशिश का
रह जाता कोई मोल नही।
गैरों ने अपनाकर अपना समझा
जब अपनों ने हो दिया त्याग
तब निज लहू की महिमा गाने का
रह जाता कोई मोल नही।
@डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’