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20 Jul 2025 · 1 min read

रह जाता कोई मोल नही

नफ़रत का बीज अंकुरित होकर
जब बन जाए विशाल वृक्ष
तब टूटे रिश्ते सिलने का
रह जाता कोई मोल नही।

विष बुझे व्यंग्य वाणों से
जब अंतर्मन छलनी हो जाए
फिर पीछे क्षमा याचना का
रह जाता कोई मोल नही।

फसल सूख कर चौपट हो
और स्वप्न कृषक के बिखर जाएँ
तब होने वाली घनघोर वृष्टि का
रह जाता कोई मोल नही।

उपचार समय पर नही मिला
और टूट चुकी हो जीवन लय
फिर जीवन देने की कोशिश का
रह जाता कोई मोल नही।

गैरों ने अपनाकर अपना समझा
जब अपनों ने हो दिया त्याग
तब निज लहू की महिमा गाने का
रह जाता कोई मोल नही।

@डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’

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