"कवि की अभिलाषा.."
चाह नहीं मैं बनूँ राष्ट्र कवि,
पाठ्यक्रमों मेँ बाँचा जाऊँ।
पुरस्कार मँचोँ पर पाऊँ,
या फिर ख़ुद पर इतराऊँ।
ले चलना बस मुझे उस जगह,
मित्र जहाँ पर मिलें अनेक।
मिलूँ सहजता से मैं सबसे,
अहम् भाव को आऊँ फेँक।
काव्य सुधा से करता जाऊँ,
मित्रों का अविरल अभिषेक।
कुछ बहकूँ, कुछ बहकाऊँ भी,
पर किँचित ना हो अतिरेक।
हँसता रहूं, हँसlऊँ सबको,
है विचार सचमुच मेँ नेक,
“आशा” बँधती शीघ्र मिलन की,
दिन गिनता प्रतिदिन हर एक..!
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