वो उड़ती पतंग
कभी खेतों-खलिहानों में,
कभी आम के रसीले बागों में,
हरियाली ओढ़े मैदानों में —
वो मिलती है
चाहत के बादलों में।
मुस्काते सपनों के झरोखों में,
नीली आँखों के दर्पण में,
झूमती-सी चलती राहों में,
अठखेलियाँ करती
पगडंडियों में —
वो उड़ती पतंग है!
अब न बाँधो मुझे किसी डोर से,
न रखना किसी और बंधन में,
न उलझाना मुझे किसी उलझन में।
मैं चलूँ —
उसके पीछे-पीछे,
ज़मीं से लेकर आसमाँ तक,
बस उसी की परछाईं में।
✍️ दुष्यंत कुमार पटेल