जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे
कैसा अजीब समंदर है इन आंखों का,
जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे…
दिल में उमंग की एक लहर उठे,
और लहरों में तैरता तू दिखे…
क्यों आंखों में ही उठती हैं लहरें सुबह-शाम,
ना कोई मौसम, ना कोई पैग़ाम…
समाए तो हो तुम मेरी साँस में,
पर वक़्त-बेवक़्त ये कैसी कसक उठे….
कैसा अजीब समंदर है इन आंखों का,
जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे…
ये आंखें हैं या रूह का समंदर कोई,
जिसमें हर जज़्बा चुपचाप उतर गया कोई…
लब खामोश थे, मगर लबों पर नाम था तुम्हारा,
धड़कनों ने हर दुआ में तुम्हें ही पुकारा…
कैसा अजीब समंदर है इन आंखों का,
जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे…
ख़्वाब में भी बस तेरा ही चेहरा,
रूह को किसी और का इश्क़ नहीं है गंवारा
अगर चाहो तो कह दूँ ये बस अश्कों की बात है,
पर हर बूंद में एक अधूरी दास्तां की सौगात है….
कैसा अजीब समंदर है इन आंखों का,
जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे…
तुमसे ही सुबह, तुमसे ही शाम,
तुम्हारे बिना सब कुछ बेनाम….
मैंने आँखें बंद की तो बस यही जाना मेरे “जाना”
तुम ही हो मेरे दिल का हर अफ़साना
कैसा अजीब समंदर है इन आंखों का,
जैसे ही की आँखें बंद तो तुम दिखे…