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22 Jul 2025 · 1 min read

कर दे तू अगर इक इशारा भी

तू अगर कर दे इक इशारा भी
छोड़ जाऊं मैं ये इदारा भी

दूर रहता हूं तेरे साए से
और चाहूं तेरा सहारा भी

निस्बतें हैं तुम्हारी फूलों से
ख़ार से वास्ता हमारा भी

काश रुख़सार से हटे नज़रें
देख पाऊं अगर नज़ारा भी

है मेरा खूं चमन की मिट्टी में
इसकी खुश्बू पे हक हमारा भी

चाँद डरता ही क्यों अंधेरे से
साथ होता अगर सितारा भी

मेरे सर पर ये जो मुसीबत है
उसमें कुछ हाथ है तुम्हारा भी

रोज़ तौबा करूँ मैं गलती से
और गलती करूँ दोबारा भी

जूझते हो जहां भँवर से तुम
है वहीं पर कहीं किनारा भी

मेरा ऑफिस कफ़स सा लगता है
है नहीं उसके बिन गुज़ारा भी

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