कर दे तू अगर इक इशारा भी
तू अगर कर दे इक इशारा भी
छोड़ जाऊं मैं ये इदारा भी
दूर रहता हूं तेरे साए से
और चाहूं तेरा सहारा भी
निस्बतें हैं तुम्हारी फूलों से
ख़ार से वास्ता हमारा भी
काश रुख़सार से हटे नज़रें
देख पाऊं अगर नज़ारा भी
है मेरा खूं चमन की मिट्टी में
इसकी खुश्बू पे हक हमारा भी
चाँद डरता ही क्यों अंधेरे से
साथ होता अगर सितारा भी
मेरे सर पर ये जो मुसीबत है
उसमें कुछ हाथ है तुम्हारा भी
रोज़ तौबा करूँ मैं गलती से
और गलती करूँ दोबारा भी
जूझते हो जहां भँवर से तुम
है वहीं पर कहीं किनारा भी
मेरा ऑफिस कफ़स सा लगता है
है नहीं उसके बिन गुज़ारा भी