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20 Jul 2025 · 1 min read

गीतिका

माँ

नित्य हाथों बना कर खिलाती रही।
माँ बच्चे सभी यूँ जिलाती रही।।

खेत में काम करती पसीना बहा।
आँख में नित्य सपने जगाती रही ।।

हौसले पस्त होने न पाये कभी ।
कोशिशों को सदा ही बढ़ाती रही।।

मंजिलों का पता बस उसी से मिला।
पथ नये खोज कर वह बताती रही ।।

ज्ञान का मान का पाठ माँ से पढ़ा।
वह हमें जीवनी सी सजाती रही।।

हाथ पकड़े हमारे रही वो सदा ।
ठोकरों से माँ हमें नित बचाती रही।।

वो रही नित खड़ी कष्ट में साथ थी।
और आशा हमारी बंधाती रही।।

रात सरला रही अँधियारी लिए।
बन उजाला हमें पथ दिखाती रही।।

डाॅ सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली

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