ग़ुस्सा — एक अनियंत्रित अग्नि
ग़ुस्सा — एक अनियंत्रित अग्नि
■■■■■■■■■■■■■■■
जब कोई अपना हमारी इच्छा के विरुद्ध कुछ करता है और वह हमारे ‘अहं’ को ठेस पहुंचाता है, तब मन में जो उग्र भाव उत्पन्न होते हैं, उसे ही हम ग़ुस्सा कहते हैं। यह एक ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया है, जो तब जन्म लेती है जब हमारी अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं — और उस असंतोष का परिणाम बनती है मानसिक अस्थिरता।
ग़ुस्सा न केवल सामने वाले के लिए पीड़ादायक होता है, बल्कि स्वयं के लिए भी हानिकारक सिद्ध होता है। इसने असंख्य जीवनों को बर्बाद किया है। ग़ुस्से की अवस्था में व्यक्ति तर्कशक्ति खो बैठता है और सही-ग़लत में भेद करने की सामर्थ्य नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि इस भावना के आवेग में कई बार इंसान किसी की ज़िंदगी छीन लेता है या किसी की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला देता है — और ये दोनों चीज़ें एक बार खो जाने पर कभी वापस नहीं आतीं।
इसलिए कहा गया है — ग़ुस्सा हराम है।
क्योंकि यह विनाश के अतिरिक्त कुछ नहीं देता।
हाँ, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना, प्रतिरोध करना आवश्यक है — लेकिन उसका स्वरूप ग़ुस्से से प्रेरित नहीं होना चाहिए, बल्कि विवेक और आत्मबल से होना चाहिए। अगर कोई हमारे निर्णय से सहमत नहीं है, तो उसे जबरन मनवाना, ब्लैकमेलिंग करना या उसकी छवि धूमिल करना यह केवल हमारी कमज़ोर मानसिकता को ही दर्शाता है।
“ना” का अर्थ “ना” ही होता है। इसे “हाँ” में बदलने के लिए दबाव बनाना न केवल अन्याय है, बल्कि अमानवीय भी है। हमें समझना होगा कि दूसरों की स्वतंत्रता में दख़ल देना हमारा अधिकार नहीं। ग़ुस्से में हम अपने सम्मान, अपने रिश्तों और अपने चरित्र — सबको दांव पर लगा देते हैं।
ग़ुस्से में बोल दिए गए शब्द समय के साथ भी शायद ही भरें। यह केवल एक भावना नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व की परख का पल भी है। जो व्यक्ति अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रख सकता है, वही वास्तव में सशक्त और परिपक्व माना जाता है।
ग़ुस्सा प्रेम को नष्ट करता है।
ग़ुस्से में लिए गए निर्णय आजीवन पछतावे का कारण बन सकते हैं।
ग़ुस्से के कारण अगर किसी की नज़रों से गिर गए — तो फिर उठना मुश्किल हो जाता है।
इसलिए, जब भी ग़ुस्से का आवेग उठे — एक नहीं, सौ बार सोचिए। अपनी सोच को तटस्थ रखिए, कारणों को समझने का प्रयास कीजिए, और सबसे बढ़कर, आत्मनियंत्रण को अपना सबसे बड़ा गुण बनाइए।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद