पंछी की व्यथा
पंछी की व्यथा
झम-झम कर रात बारिश हुई थी
कड़कती थी रह-रह कर बिजली,
तेज आंधियों संग ओले गिरे थे
वृक्ष कई उखड़े पड़े थे।
रात्रि भर बारिश की बूंदे
टिप टिप कर जमकर थी बरसी,
अतृप्त धरा सिंचित हुई थी
जो प्यासी थी बूंद बूंद को तरसी,
कृषकों के हर्षित स्वर से
व्योम भी गुंजित हुआ था।
पर अंधेरी रात में खग
भींगे पंखो को समेटे,
जिस डाल पे दुबका पड़ा था
वो डाल भी टूटकर गिरी थी।
उड़ न सका गंतव्य तक वो
रात झारियों के नीचे कटी थी,
सुबह की बेला जब आयी
प्रकृति की छटा थी विहंगम,
पर मनोरम प्रभात
मद्धिम नजर से दिख रहा था।
भोर का स्वर्णिम पहर
भावशून्य जैसा लग रहा था,
चहचहाते पक्षी जो नित दिन
जग को जगाना भूल बैठे।
गाता था मथुर स्वर में पंछी
आज वो दिखता नहीं था,
बुलबुल की कोरस ध्वनि भी
किसी के कानों में न थी पहुंची,
सतबहना वो भुल्ल मैंना
लड़ती झगड़ती फैलाती जो डैना,
रोज छत पर चहचहाती थी
आज कहां भटकी फिरी थी।
छज्जे पर बैठा पेंड़ुकी का जोड़ा
भय से अभी तक सहमा हुआ था,
नन्ही सी फुदकिन चिड़ैया
फुदकना क्यों भूल बैठी।
खग वृंद ऐसे रुठा पड़ा हो
जैसे जग झूठा लगा हो।
पर एक बया का घोसला सुरक्षित
डाल पर लटका अड़ा था,
उनकी कुशल कारीगरी के आगे
दुश्मन भी मुंह लटकाए खड़ा था।
रखते हो उड़ते पंछी की तमन्ना
तो फिर उनकी व्यथा पहचानो,
आंधियों में अटल रहने का कौशल
बया के कुशल कारीगरी से जानो..
“मौलिक एवं स्वरचित”
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि –१९ /०७ /२०२५
श्रावण ,कृष्ण पक्ष, नवमी तिथि ,शनिवार
विक्रम संवत २०८२
मोबाइल न.– 8757227201
ईमेल पता – mk65ktr@gmail.com