सती-वियोग और महाक्रोध”
न करुणा करुण हो कहीं न मौन मौन में बँधे
न शिव शिवत्व से जले न धैर्य धैर्य से रहे
न दिशा दिशा को पुकारे न शून्य शून्य से डरे
न प्राण प्राण को थमे न शोक शोक में भरे
अविरत तांडव शून्य का प्रलय पयोधि पार से
जटाओं में गरज उठा विकंप क्रोध धार से
विनाश वंश दंश का, समर्पित रक्त-गंध को
जगा दिया महाकल ने प्रचंड वीरभद्र को
कंपीत भूधरा हुई, दिशाएँ रक्त से रँगी
कराल दृष्टि में जली समस्त यज्ञ की अंगी
शून्य में बिखर गया सारा सृजन-संहार कर
महादेव रो उठे व्यथित, “सती… सती…” पुकार कर |
✍️✍️Kavi Dheerendra Panchal [ Raahi ]