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19 Jul 2025 · 1 min read

किनारा

समझा था जीवन का सहारा जिसको,

वो किनारा न जाने अब खो गया कहाँ?

हरा था भरा था लुभावन था भरपूर कभी,

उड़ती बिखरती है रेत ही रेत अब वहाँ।

पंक्ति बद्ध छपे पद चिह्न थे जो किनारे पर,

तूफांन आकर बिखरा गया यहाँ से वहाँ।

सुंदर वो किनारा बह गया इक रोज़ कहीं,

बैठकर बिताए थे सुहाने पल हमने जहाँ।

दुपट्टे की किनार चुरा लाई कुछ नरम यादें,

कोने से लिपट करती हैं बीती बातें बयाँ।

किनारे की ही किसी बस्ती में बसकर हम,

बनाएँगे सुंदर स्नेहिल यादों का घर यहाँ।

तिनका-तिनका जुड़ा तो चमन खिल उठेगा,

कस्ती इस जीवन की होगी फिर से रवाँ।

किनारा भी मिलेगा वही सहारा भी मिलेगा,

धरती गोल है, किनारा आखिर जाएगा कहाँ?

लेखिका

गोदाम्बरी नेगी

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