जब भी बिस्तर को देखता हूं मैं
जब भी बिस्तर को देखता हूं मैं
उसकी सिलवट सहेजता हूं मैं
वक्त जो हाथ से छिटकता है
उसके लम्हे समेटता हूं मैं
कट गई है पतंग रिश्तों की
अब तो डोरी लपेटता हूं मैं
क्या तुझे लग रही हूं परदेसी
गौर से देख रेख्ता हूं मैं
बांट डाला है घर को जिन्होंने
उन लकीरों को मेटता हूं मैं
जाग कर रात में अमावस की
चांद के ख्वाब देखता हूं मैं
कोई तस्वीर बन नहीं पाती
जाने क्या-क्या उकेरता हूं मैं