"वह अच्छे दिन"
जीवन के अच्छे दिन, वो जाने किधर गए।
खुद को संवारने में हम,खुद ही बिखर गए।।
परिवार छोड़ दिया ,
वेहतर की आश में,
मां-बाप खो दिए,
जिंदगी तलाश में,
नूतन न मिल सका, पुरातन भी खो दिए।
जीवन के अच्छे दिन, वो जाने किधर गए।।
यहां दोस्त बहुत मिले,
पुराने जैसे नहीं मिले,
अपने भी बहुत मिले,
अपने जैसे नहीं मिले,
दिखावे में आकर, अपनों को खो दिए।
जीवन के अच्छे दिन, वो जाने किधर गए।।
बहन-भाई-भाई के रिश्ते,
मां-बाप और पड़ोसी के रिश्ते,
पति-पत्नी और देवर-भाभी के रिश्ते,
सास-ससुर और साली के रिश्ते,
घर के रहे ना घाट के, न जाने किधर गए।
जीवन के अच्छे दिन, वो जाने किधर गए।।
रिश्ता न ऐसा कोई,जो बदनाम न हुआ,
कोई छुपा ऐसा कुकृत्य,सरे आम ना हुआ,
ऐसा कोई रिश्ता, जिसमें कत्लेआम न हुआ,
दिखावे में कभी,सच्चा प्यार न हुआ,
छोटी सी अन बन पर, धरम बदल दिए।
“यादकेत”न जाने वो बच्चे किधर गए।।
स्वरचित रचना-डॉ० ओमवती ‘यादकेत’
सैदनगली अमरोहा (उ०प्र०)