वारती तन-मन
आधार छंद– प्रगाथ समवृत्त
*यति– 8,7
गणावली— रमगग, रनल
अंकावली- 212-222-22, 212-111-1
सृजन शब्द- वारती तन मन
बूंँद ले वर्षा की धारा, वारती तन-मन।
झींगुरों के नादों में है, प्रेम से झन-झन।।
रागिनी गाती है झूमे, ले हवा थिरकन।
ठंड फैलाती है तीखी, यातना सिहरन।।
रूपसी के गीले-गीले, अंग में कसकन।
अंचरा में फैला पानी, तेज है धड़कन।।
कामिनी उन्मादी लोभी, यौवना दरसन।
बाध्यता मेघों में पाया, झाँकता दरपन।।
बादलों को झंझोड़े क्यों, दामिनी प्रहसन।
ये कहाँ-कैसे है आई, जो हुआ उपजन।।
रूप सज्जा शृंगारी है, सुंदरी दुलहन।
धूंध में बैठी शर्माती, ओढ़ती पुलकन।।
है धरा कैसे संधानी, रंग ले सिरजन।
गर्भ में पाले संजोए, धारती प्रजनन।।
धौंकनी साँसों में जैसे, खौलता अदहन।
जोर मारे झंझावातें, कामना प्रवहन।।
सौंपती प्यासी दीवानी, मूंदती अँखियन।
जोड़ रिश्ता पी से न्यारा, छोड़ के सखियन।।
चंद्रिका माथे पे फैली, रात की उतरन।
सौंपती आधारें सारा, क्या बचा कतरन।।
नाम इच्छा-आकांक्षा का, तोड़ता प्रचलन।
हाथ जोड़ूंँ मैं तो हारी, है कथा अबरन।।
जो बुढ़ापा आशाओं में, देखता बचपन।
वंश बाढ़े आशीषों में, साधना पुरखन।।
कीचड़ों में खेले बच्चे, माँजते अबटन।
हौंसले जो पूरे-पूरे, हारता विघटन।।
सृष्टि संचारे कर्मों की, भावना भटकन।
है भरोसा साथी मेरा, मैं नहीं असरन।।
झूमते हैं सारे पौधे, हो रही सिहरन।
बाट जोहे आशाओं में, जागती बिरहन।
आ रहा वर्षा के आते,वो गये अगहन।
कौन जाने संतापों को,दे रहे दहकन।।
पाण्डेय सरिता ‘राजेश्वरी’