*पूज्य पिताजी*
जिन्होंने मेरा जीवन है सुधारा,
हर पल मुझको दिया है सहारा।
मेरे लिए अपनी बाहों का झूला है बनाया,
हमारे लिए सब कुछ है जुटाया ।।
पिताजी वो आप थे ।।
मंजिल पथ पर जब मैं बढ़ना सीखी,
आपने हमको प्रेरित किया था।
बचपन से अब तक खुशी मुझको देकर,
हर गम जिन्होंने मुस्कुरा कर सहा था।
पूज्य पिताजी वो आप थे।।
जब कोई गम, मेरी तरफ आया,
वह दर्द से यूं ,सिहर उठते थे।
जीवन के हर मोड़ पर, वह सहारा बने थे,
चाहे हो खुशी भारी, या गम घने थे।
उनकी कुर्बानियों का ऋण, चुकाऊ मैं कैसे,
अब तो वह इस दुनिया में नहीं है ।
पूज्य पिताजी वो आप थे ।।
वृक्ष ऐसा लगाया, जिसका फल भी नहीं खाया,
मैंने अनजाने कहीं आपका, दिल तो न दुखाया।
रास्ते में अकेला छोड़ यूं ही मुझको,
न जाने कहां आपने घर है बनाया ।
पूज्य पिताजी वो आप थे।।
तमन्ना थी कि आपका सहारा बनू मैं ,
जीवन की परिस्थितियों से मजबूर थी मैं।
खो गए कहीं वो ढूंढती आज तक रह गई मैं,
अब तो सहारा नहीं किसी खास का है।
न सिर पर ही साया वो ‘बाप’ का है,
पूज्य पिताजी आप थे।।
न कर सकी कोई सेवा ही मैं आपकी हूं,
सुनो दुनिया वालों अब हर मोड़ पर मैं बिना ‘बाप’की हूं।उनकी यादों को मन में सजोए हुए हूं,
मिला था जो मुझको,ईश्वर रूपी तोहफा वह खोए हुए हैं।
पूज्य पिताजी वो आप थे।।
स्वरचित रचना – डॉ० ओमवती ”यादकेत”
सैदनगली अमरोहा ( उ०प्र०)