Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
18 Jul 2025 · 2 min read

शीर्षक- “शादी या सौदा”

वर्तमान समय में शादी “सौदा” का रूप लेता जा रहा है। इस कविता के माध्यम से मैंने अपना विचार रखा है ।

शादी का रिश्ता पवित्र माना गया,
पर इसमें भी अब मोल-भाव लिखित है।
जहाँ प्यार, भरोसा और वचन होने थे,
अब लिस्ट में गाड़ियों और गहनों के क़ीमत होने लगे।

लड़का सरकारी है, भाव तय हो गया,
पापा बोले – कुछ नहीं माँगा और सौदा वहीं हो गया।
लड़की सुंदर, समझदार, संस्कारी सही,
पर बिना पैसों के रिश्ता नहीं होता कहीं।

दीवारों पर ‘बेटी बचाओ’ के नारे सजाए जाते हैं,
पर मंडप में उसी बेटी के दाम लगाए जाते हैं।
बोली लगती है शान की, नहीं होती रिश्तों की सुनवाई,
और बेटी के बाप जोड़ते रह जाते हैं हर इक पाई।

सात फेरे लेकर करते हैं प्रेम की बात,
पर गाड़ी, कैश और गहनों से होती है शुरुआत।
बेटी को बहू बना कर घर लाते हैं,
फिर हर रोज़ दहेज का हिसाब सुनाते हैं।

मंदिर में शादी होती है, पर सौदा मंडप में ठहरता है,
लड़की के गहनों से बाप का कद नापा जाता है।
इज़्ज़त की बातें बस दिखावे में रह जाती हैं,
दहेज ना मिले तो बहू पर ऊँगली उठाई जाती है।

दूल्हा अपनी नौकरी पर खूब इतराता है,
दुल्हन का बाप आँसू पीकर भी मुस्कुराता है।
जो बेटी उड़ना चाहती थी अपने सपनों की दिशा में,
वो अब बिकती है चुपचाप, रिश्तों की परिभाषा में।

शादी या सौदा – सवाल नहीं, कड़वा सच है,
जहाँ बेटी की कीमत दूल्हे की सैलरी से तय है।
जिसे चाहिए था अपनापन, स्नेह और मान,
उसे थमा दी गई शर्तें और झूठी मुस्कान।

🖋️कुमार अनु

Loading...