Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
18 Jul 2025 · 1 min read

माँ ....

माँ ….

बताओ न
तुम कहाँ हो
माँ

दीवारों में
स्याह रातों में
अकेली बातों में
आंसूओं के
प्रपातों में
बताओं न
आखिर
तुम कहाँ हो
माँ

मेरे जिस्म पर ज़िंदा
तुम्हारे स्पर्शों में
आँगन में गूंजती
आवाज़ों में
तुम्हारी डाँट में छुपे
प्यार में
बताओं न
आखिर
तुम कहाँ हो
माँ

बुझे चूल्हे के पास
या
रंभाती गाय के पास
पानी के मटके के पास
बताओं न
आखिर तुम
कहाँ हो
माँ

माँ
तुम जब से गयी हो
मेरा अस्तित्व
शून्य की परिभाषा
बन गया है

माँ
मैं तो सदा से
तुझ में समाया रहा
पहले गर्भ में
फिर आँचल के गर्भ में
फिर तेरी ममता के गर्भ में
फिर तेरी धुंधलाती दृष्टि के गर्भ में
बता न माँ
तू मुझे

गर्भाश्रय से वंचित क्यों कर गई

माँ
तू मुझे दीवार पर
अच्छी नहीं लगती
मुझे तस्वीर नहीं
माँ चाहिए
जो मुझे
अपने हाथों से मुझे
स्पर्श स्नान करा दे
मुझे अपने आँचल में छुपा ले
अपनी लोरियों से मुझे सुला दे
माँ
तू अपनी लाल का रुदन
सुन रही है न
मैं थक गया हूँ
तुम्हें पुकारते पुकारते
अब तो बताओं न
आखिर तुम
कहाँ हो
माँ
ए……..क

बा………र तो
आ जाओ
माँ ाँ ाँ ाँ ाँ ाँ

सुशील सरना

Loading...