दोहा पंचक. . . . . प्रेम
दोहा पंचक. . . . . प्रेम
पाती पढ़कर मीत की, भीगे विरही नैन ।
दृगजल से आखर मिटे, हृदय हुआ बैचैन ।।
आँखों ने समझी नहीं, आँखों की ही बात ।
इंतजार में दिन गया, कटी आँख में रात ।।
अन्तस की हर बात का, दृग करते अनुवाद ।
संवादों की श्रृंखला , पूर्ण करें उन्माद ।।
बरसातों में मीत की, जब तड़पाती याद ।
बहुत गूँजती देह में, स्पर्शों की नाद ।।
मन में हलचल सी उठे, जब देखूँ तस्वीर ।
बड़ी अजब है यार की, उल्फत की तासीर ।।
सुशील सरना /