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18 Jul 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . . प्रेम

दोहा पंचक. . . . . प्रेम

पाती पढ़कर मीत की, भीगे विरही नैन ।
दृगजल से आखर मिटे, हृदय हुआ बैचैन ।।

आँखों ने समझी नहीं, आँखों की ही बात ।
इंतजार में दिन गया, कटी आँख में रात ।।

अन्तस की हर बात का, दृग करते अनुवाद ।
संवादों की श्रृंखला , पूर्ण करें उन्माद ।।

बरसातों में मीत की, जब तड़पाती याद ।
बहुत गूँजती देह में, स्पर्शों की नाद ।।

मन में हलचल सी उठे, जब देखूँ तस्वीर ।
बड़ी अजब है यार की, उल्फत की तासीर ।।

सुशील सरना /

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