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18 Jul 2025 · 1 min read

व्यर्थ भटकते रोते हरदम

व्यर्थ भटकते रोते हरदम
कहते जग को है मेरा
कोई तेरा साथ न देगा
स्वाद सभी को है प्यारा
सूरज भी जग से रे हारा
परछाई ने अंध बिखेरा
निज अंतस को खुद झकझोरों
दूर करो छाया अंधेरा।।
संजय निराला

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