व्यर्थ भटकते रोते हरदम
व्यर्थ भटकते रोते हरदम
कहते जग को है मेरा
कोई तेरा साथ न देगा
स्वाद सभी को है प्यारा
सूरज भी जग से रे हारा
परछाई ने अंध बिखेरा
निज अंतस को खुद झकझोरों
दूर करो छाया अंधेरा।।
संजय निराला
व्यर्थ भटकते रोते हरदम
कहते जग को है मेरा
कोई तेरा साथ न देगा
स्वाद सभी को है प्यारा
सूरज भी जग से रे हारा
परछाई ने अंध बिखेरा
निज अंतस को खुद झकझोरों
दूर करो छाया अंधेरा।।
संजय निराला