दोहा सप्तक. . . . पूजा
दोहा सप्तक. . . . पूजा
पूजा मन के भाव का, अनुपम है अनुवाद ।
इसमें जो डूबा मिटे, मन के सभी विषाद ।।
पूजा मन की कामना, सदा करे साकार ।
तिमिर मिटे हो रोशनी , पावन मन के द्वार ।।
मन में है जब स्वार्थ तो, पूजा है बेकार ।
ऐसी पूजा से भला, किसका हो उद्धार ।।
पूजा का मत कीजिए, दिखावटी शृंगार ।
इससे मन के हों सदा, उन्नत और विकार ।।
जीवन के संघर्ष हों, पूजा से आसान ।
लक्ष्यों के परिणाम से, मिटते सब व्यवधान ।।
नयन मून्द पूजा करें, हृदय मगर बैचैन ।
चिन्ता से रहता भरा, मन का रिक्त मकान ।।
पूजा के पाखंड से, सिद्ध न होते काम ।
सच्ची पूजा से सदा, मिलें सफल परिणाम ।।
सुशील सरना / 18-7-25