छंद।
लेखनी उठा के सोचा श्रृंगार को लिखता हूं,
किंतु शब्द शब्द मेरा ओज का प्रतीक है,
मेंहदी लिखी तो मेरे आंसुओं में रक्त वहा,
कंगन लिखा तो हाथ बारूद से तृप्त है,
कंगन न मेंहदी न काजल लिखा जाएगा,
देश सांसदों के झूठे वायदों से तृप्त है,
और अब के जो वायदों को तुम न निभा सके तो,
सोच लेना मोदी जी के अठ्ठाईस ही अंत है।।
अब के जो वायदों को…………………………
तो जब जब लिखा गया सत्ताओं के पक्ष में तो,
हीरे मोती शोहरत खूब वो बटोर गए,
किंतु लेखनी का सौदा करके जो बाबू बने,
इतिहास में वो चमचों का नाम पा गए,
और सत्य की शपथ लेके लेखनी उठाई मैंने,
अंध भक्तों के तो फिर डोरे लाल हो गए,
और दस साल में जो एक कॉन्फ्रेंस न कर पाए,
मन की बात कहके वो बैंक लुटवा गए।
दस साल में जो एक…………………………….