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18 Jul 2025 · 2 min read

प्रणय क्रीड़ा

“प्रणय” सिर्फ एक कृति नहीं
एक कलाकृति है
तुम्हारे साथ प्रणयी क्रीड़ाओं
को साझा करना मेरे लिए किसी कला से कम नहीं,…
और इस कला में शायद हम दोनों ने ही आपस में धीरे-धीरे निपुणता प्राप्त की है…
सर्वप्रथम हमने मन का समर्पण किया है,
मन के समर्पण तथा चेतना प्रेममयी होने के पश्चात, तन का समर्पण कर इस प्रणय क्रीड़ा को
सर्वश्रेष्ठ स्तर तक पहुँचाया है…
तपते बदन को पानी के नीचे ले जाकर शीतल करना ओर पुनः अपने चुंबनों के द्वारा शीतल बदन की वासनात्मक अग्नि को जला देना ही
प्रणय क्रीड़ा है…
ललाट पर अधरों के स्पर्श
अधरों से अधरों का मिलन
एक प्रेममयी आलिंगन से….
फिर…
नयनों के मिलन से
हम एक दूजे की देह पर प्रणयी कलाकृतियां
उकेरने लिए हमेशा ही तैयार रहे है, सच तो यह है की लज्जा के आवरण ने हमारे मिलन में कभी भी बाधा उत्पन्न नहीं की
अपितु…
जैसे जैसे हम
एक दूजे में समाने के लिए लालायित होते रहे
वैसे वैसे हमारे श्वासों का आरोह अवरोह
तथा दोनों की हदयगति,
“मेरे पुरुषत्व और तुम्हारे स्त्रीत्व” ने इस मिलन का पार्श्व गीत बजाया है…
कितनी धैर्यता से अधीर होकर
एक दूजे की देह का प्रत्येक गलियारा हमने अपनी जिव्ह्या के स्पर्श से नापा है…
हर एक स्पर्श पिछले स्पर्श से
अधिक समाधानकारक और
अधिक उत्तेजित करनेवाला
होता रहा है…
तुम्हारे वक्षस्थल की खुशबु हो या हो श्रीस्वखलित मार्ग की स्वप्निल महक दोनों ने ही मुझे हमेशा मदहोश किया है….
अपने अधरों के हस्ताक्षर से मैंने, तुम्हें हर पल अपने प्रेम के लिए समर्पित किया है…
प्रेम लय के सागर में बहते हुए बहुत सारे दाग़ और पीड़ाएँ भी दी हैं परन्तु उन पीड़ाओं ने तुम्हें हर पल मधुर आनंद ही दिया है…
एक दूजे में घुलती गर्म श्वासे,
हदयगति, धमनियों में होते तेज
रक्त प्रवाह ने हम दोनों के तन को
तृप्त किया है….
और फिर इन अभिसार क्षणों का
समापन भी आरंभ की तरह
ललाट पर अधरों के स्पर्श और
एक प्रेममयी आलिंगन से ही
होता रहा है…..
वर्षों उपरांत भी हमने तन के मिलन से पहले
एक दूजे के मन और चेतना का मिलन किया, तदुरांत ही हमने अपने प्रेमिल एहसास के सुवास से प्रेममयी आलिंगन के द्वारा एक-दूसरे को स्पर्श किया-
भावनाएं और संवेदनाएं चरम पर जा पहुंचीं…..
और फिर शांत पहाड़ी पर जो वक़्त गुज़ारा हमने,
वो एक खूबसूरत एहसास है….
ना शब्दों की ज़रूरत है…
और ना ही किसी वजह की तलाश है…
वो पल बस दिल के किसी कोने में
सुकून बनकर ठहर गया,
जिसे याद कर,
आँखें नम हुईं…
और दिल बस फिर से वहीं रह गया…
बरसों की शिकायत की धूल कुछ ऐसे हटी…
हम मिले, तुम मिले,
मिल गई खोई खुशी…
प्रेम, विश्वास, अपनापन साथ लिए,
एक आग़ाज़ हुई नई शुरुआत की…..
बस ये सफ़र अब यूँ ही चलता रहे,
हर मोड़ पर तुम्हारा मेरा हाथ लिए,
बस ये सफ़र अब यूँ ही चलता रहे……

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