अजनबी मुसाफिर थे तन्हा राहों में
दोस्तों,
एक नज्म आपकी मुहब्बत के हवाले,,
नज़्म :-
अजनबी मुसाफिर थे तन्हा राहों में
प्यासी जमीं को, जीवन मिल गया,
बूंद गिरी पानी की बदन खिल गया।
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अजनबी मुसाफिर थे तन्हा राहों में,
चंद मुलाकात में कोई ले दिल गया।
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मुझको हाल ए दिल की ख़बर न थी,
न जाने कैसे पैदा कर मुश्किल गया।
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सब कुछ लुटा देख मैं हैरान हो गया,
देखा गिरेबाँ अपना कि मैं हिल गया।
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खुद पर यकींन न कर उस पर किया,
वही शख्स दिल को कर चोटिल गया।
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क्या खूब कहा है शायर “जैदि” तुमने,
डूबा दरिया में,जो छोड़ साहिल गया।
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शायर:-“जैदि”
डॉ.एल.सी.जैदिया “जैदि”
बीकानेर।