मैं स्वयं में तुमको जगाने लगा
मैं स्वयं में तुमको जगाने लगा, गीत गाने लगा, गुनगुनाने लगा।
तुम्हारी छाया में अपने को पाने लगा, तुमसे मिलकर मैं खुद को सजाने लगा।
अब तुम्हीं से मेरे अर्थ बनने लगे,
मन के भीतर भी कुछ भाव बहने लगे।
मुख की ध्वनि–शून्यता रागिनी हो गई,
साँस की तूलिका चित्र रंगने लगे।
रूप किरणों से शब्द रचाने लगा, स्वर्ण आभा में छंद उगाने लगा।
तुम्हारी आँखों में जो मौन से प्रश्न हैं, मैं उन्हीं से उत्तर बनाने लगा।
मैं नयन मूँद जब भी देखूँ तुम्हें,
स्वप्न की चुप्पियाँ बोलतीं हैं सदा।
साँझ सिंदूरी कान्ति तुम्हीं से मिले,
रजनी लेती है तुमसे जो पूनम अदा।
तारों ने खुद चमक कर अक्षर गढ़े, बिंब भी चाँदनी को बिछाने लगा।
हुस्न की धूप भाषा सिखाने लगी, व्याकरण चाँद मुझको बताने लगा।
मैं स्वयं से अधिक अब तुम हो गया,
साधना का मेरे प्रेम–धर्म बन गया।
पाकर तुमको मैं खुद ही सरल हो गया,
सूखे पल का था कण, मैं तरल हो गया।
प्रीत झरने लगी, नेह बहने लगा, मन–सरोवर प्रणय को खिलाने लगा।
अब तुम्हीं में समर्पण ठहरने लगा, प्रेम खुद को तुझमें डुबाने लगा।
न कोई दीपक यहाँ, न ही दीपशिखा,
तेरे होने की लौ में है सब कुछ दिखा।
तुम जली जब चिरागों सी मन–आँगन में,
हर कहानी है लिखती तुम्हारी कथा।
रोहिणी में तुम्हारा ही आलोक है, मैं नक्षत्रों के उस पार जाने लगा।
सृष्टि से भी परे कोई संबंध है, मैं वही सूक्ष्म बंधन निभाने लगा।
मेरी साँसों में अब है तुम्हारा ही स्वर,
तेरी खुशबू के रंगों में गीत लहर।
तुम न हो तो स्पंदन अधूरा लगे,
तुम हो गर तो क्षण ख़ाली पूरा लगे।
एक अबोला कहन भी मुखरने लगा, आत्म–स्पर्श दर्शन–सा देने लगा।
भाव अंतस तरंगें उठाने लगा, मानसी बाँसुरी को बजाने लगा।
तुम ही बोली मेरी, तुम ही संकेत हो,
मेरे खामोश अनुवाद का शेष हो।
अब तुम्हारे बिना कुछ भी कह न सकूँ,
बिन तुम्हारे अब न मैं कुछ लिख सकूँ।
तुमने हँसकर उजासों–सी बात की, मैं उसी रोशनी को चुराने लगा।
तुमको गुनने लगा, तुमको बुनने लगा, तुमको लिखकर मैं खुद को सुनाने लगा।
✍️ – कुँवर सर्वेन्द्र विक्रम सिंह
🔸 स्वरचित रचना
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