ग़ज़ल
ग़म ज़िगर का मैं भुलाना चाहता हूँ
बस ज़रा सा मुस्कुराना चाहता हूँ।
हो सके तो माफ़ कर देना तुम मुझे
मैं तुम्हें तुमसे चुराना चाहता हूँ।
प्यार में गुम हो न जाए यार मेरा
राह में दीये जलाना चाहता हूँ।
चाँद कितना भी छिपे मेरी नज़र से
चाँद को दिल में बसाना चाहता हूँ।
रह गए हैं नैन तुममें ही उलझकर
तुम्हे दिन रात गाना चाहता हूँ।
#डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’